(पार्ट-I): इस छोटी-सी सत्य-कथा के बिना हमारा पार्ट-2 समझ नहीं आएगा। एक परिश्रमी लकड़हारे का कुल्हाड़ा कुँए में गिर गया था। कुएं से प्रकट हुई एक देवी ने उसे पहले एक सोने का, फिर चांदी का कुल्हाड़ा दिया, जो उसने लेने से मना कर दिया कि उसका नहीं है। प्रसन्न होकर देवी ने उसे उसका लोहे का कुल्हाड़ा देते हुए कोई भी एक वरदान मांगने को कहा। उसने एक दिन की मोहलत ली और घर आकर सबसे पूछा। बूढ़ी माँ ने अपनी आँखों की रौशनी, पत्नी ने संतान, और पिता ने अपना खोया राज्य मांगने को कहा। वरदान एक, इच्छाएं तीन। अंततः वह अपने एक मित्र के पास गया। उसने तुरंत ही उसे सलाह दी कि मांगो: "मेरी माँ अपने राज्य में सुखपूर्वक अपने पोतों का मुख देख सके!" वरदान ग्रान्टेड; पर देवी को लगा कि यह थ्री-इन-वन में मुझे 'चीट' कर गया है। अतः एक चेतावनी भी दे डाली कि आज से तुम्हारे उस कायस्थ (भटनागर, आदि) दोस्त के घर सरस्वती तो रहेगी, किन्तु लक्ष्मी नहीं रहेगी जिसने यह शब्द-जाल बुना है!.. (लगता है, हम व्यर्थ ही सेकंड इनिंग्स के इंटरव्यू दिए जा रहे हैं!)
(पार्ट-2): आज सुबह से ही हम भाव-विभोर थे। आज ही के दिन 30 साल पहले हमने नौकरी जॉइन की थी। मन किया, आज घर के छोटे-से मंदिर की ही सफाई कर लेते हैं जहाँ हम वक़्त बेवक़्त घर लौटने पर दिया जला कर भगवान जी को डिस्टर्ब करते थे। कभी लक्ष्मी जी को, कभी सामने अपनी कंप्यूटर टेबल को निहार रहे थे! अवचेतन-मन का तो जैसे आज डिवाइन कनेक्शन ही जुड़ गया था!.. "सर ने मना किया हुआ हुआ है इधर आने को?" (इंटरव्यूज का परिणाम है कि जब-तब सर/मैडम मुंह से निकल जाता है।) "..कितनी दिवाली पर हमने आपके चरण-चिन्ह बनाए.. कभी दिल नहीं किया एक बार देख आऊं?.." लक्ष्मी जी ने कहा: "एक अज्ञात देवी के श्राप के कारण मैं यहाँ नहीं आ सकती। उसने तो पूरा इंतज़ाम कर लिया था तुम्हे डाकघर के बाहर बैठाने का। मोदी जी का शुक्र करो कि ई-मेल का ज़माना आ गया; नहीं तो वहीँ बैठे चिठियां लिख रहे होते!" हम तो डर से कांप ही गए कि उस लकड़हारे का हमारे किसी वंशज ने क्या साथ दिया, हम तो खुद फँस गए! हमारे बहुत अनुनय विनय करने पर वह बोलीं: अपने सब भाई-बहनों की ओर से एक क्षमा याचना पत्र उस लकड़हारे वाली देवी को भिजवा दो तो शायद उस श्राप से मुक्ति मिल जाए। हमने अवरुद्ध कंठ से याचना की: मैम, (सॉरी) देवी माँ - वो अज्ञात देवी हमें कहाँ मिलेगी - आपकी ही फ्रैंड-लिस्ट में कहीं होगी - आप ही हमारा अश्रुपूर्ण माफीनामा उन्हें फॉरवर्ड कर दें; आपकी तो टेक्नोलॉजी भी बहुत एडवांस्ड है!. "ठीक है - मैं मासूम बातों में बहुत जल्दी आ जाती हूँ - अबकि दिवाली पर अपना माफीनामा, बस, मेरे चरणों में रख देना और किसी के 'लाइक'/ 'डिसलाइक' का जवाब मत देना!"
( ..दुःख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे!) 💐
Thursday, 23 May 2019
श्राप व वरदान
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