Monday, 27 May 2019

मनी सेव्ड, मनी अरण्ड

समझ गया मैं आपका संकेत। एक सप्ताह बाद कम्प्यूटर टेबल पर बिखरे (मतलब बिखराए) कागज़ात आज हमने बदल दिए हैं। आस-पड़ोस में चर्चा गर्म है कि हमारा वर्क फ्रॉम होम ठीक चल रहा है। अब कोई हमें निकम्मा नहीं समझता; बल्कि कई पूछ लेते हैं कि रोज़ कितना कमा लेते हो। दो-चार सौ कहने पर वे हिम्मत भी बढ़ाते हैं कि चलो घर बैठे 8-10 हज़ार की कमाई बाहर के 15 के बराबर है। अब झूठ बोल कर कब तक हम कानों को हाथ लगाते रहेंगे - इसका तरीका भी हमने खोज लिया है। कहते हैं न कि "money saved, money earned" - बस, हमने इस मुहावरे को ही अपना लिया है। रोज़ के अपने खर्चे की बचत कर, हम उसे अपने वर्क फ्रॉम होम अकाउंट में ट्रान्सफर कर देते हैं, और खुद को झूठ बोलने के पाप से बचा लेते हैं। मसलन, कल बेटे ने कहा, आपके सी. पी. जाने के लिए कैब बुक करा रहा हूँ, तीन सौ लगेंगे। मैंने कहा, पक्का बता दो कि यह तीन सौ हमारी ओर हुए? उसके "हाँ" कहने पर हमने कहा, ठीक है, यह तीन सौ हम अपनी डायरी में आज की तारीख में लिख लेते हैं, आप कैब मत कराना। वह बिना कुछ समझे ऑफिस के लिए निकल गया। अब सच बोलो तो पूरा बोलो। हमने आज की बचत में 250 ही लिखे हैं। सड़क पर एक ऑटो वाले ने पूछा - मेट्रो स्टेशन? हमने कहा: भैया हमारी जेब में बस एक 50 का नोट और कुछ गोलियां हैं (डिस्पिरिन की); जहाँ मीटर में 50 की रीडिंग आ जाए तो रोक देना, हम आगे पैदल चले जाएंगे। वह फ़ौरन मान गया। दिल्ली वाले डरते भी बहुत हैं, डराते भी बहुत हैं। कइयों ने तो कार के पीछे लिखवा रखा है: जगह मिलते ही तुरंत साइड दी जाएगी - कृपया गोली न मारें!      

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