छोटे भाई को हस्पताल ले जाते समय उनके ऑफिस के सरकारी नियम मालूम नहीं थे। अब उम्र बीत गई, पर अपने ऑफिस के नियम ठीक से मालूम नहीं। सरकारी हस्पतालों के नाम से और प्राइवेट वालों के दाम से ही दिल कांपता है! बड़े हो रहे बेटे से भी एक बार पूछ बैठे, 'कभी अचानक कुछ हो गया तो संभाल लेगा.. गाड़ी-वाड़ी चला लेगा.. घबराएगा तो नहीं?' (उसी बातचीत पर आधारित) बेटे के अनुसार, उसे हमारे मेडिकल रूल्स मालूम होने चाहिएं ताकि किसी इमरजेंसी में वह सही दिशा में जा सके; यानि वह सामान्य 102 नंबर पर फोन करे या हमारे किसी पैनल के हस्पताल की एम्बुलेंस बुलाए। स्वयं कार ड्राइविंग पर तो उसे भरोसा है, पर उसकी कई अन्य छोटी-छोटी बातें भी गौर करने योग्य हैं। जैसेकि, कार का फिट कंडीशन में होना; विशेषकर रात्रि में कुछ लोग आगे-पीछे गाड़ियां खड़ी कर रास्ता ब्लॉक कर देते हैं, ऐसे में तुरंत चौकीदार से संपर्क करना चाहिए; अपने पड़ोसियों के काम आना चाहिए ताकि वे भी ऐसे में सहयोग कर सकें; मेन-रोड़ पर खुलने वाले गेट भी कहीं-कहीं रात में बंद रहते हैं, अतः वैक्लिप मार्ग तथा आगे के रूट की जानकारी हो; कई बड़े हस्पतालों में पार्किंग दूर होने पर अकेले व्यक्ति के लिए यह कठिन होगा (एम्स में ही पार्किंग एक किलोमीटर से अधिक दूर है)। इस प्रकार तो पेशेंट के साथ सदा ही दो लोग आवश्यक हैं ताकि एक उनके साथ रह सके और दूसरा यहां-वहां जा सके। दिन में जहां कुछ काम आसान रह सकते हैं, वहीं महानगरों के एक अन्य बड़े अभिशाप - 'ट्रैफिक जाम' - से जूझना पड़ सकता है। निःसंदेह, ऐसे में एम्बुलेंस फिर भी अपना रास्ता जल्द निकाल लेगी। एक बार, सही हस्पताल पहुंचने पर तो फिर डॉक्टर ही अपना काम करेंगे -- आप अपना -- मतलब रुपए-पैसे का प्रबंध आदि। ..रात सोने से पहले भी एक साधू-महात्मा की ऐसी ही कहानी पढ़ ली जो बरसों पहले अपनी युवावस्था में ही मरघट में जाकर बैठ गए थे। लोगों के पूछने पर बोले, 'एक दिन यहीं तो आना है। फिर क्यों किसी को कष्ट दें!' ..अब जहां दिन भर ऐसी बातें होंगी तो सपने भी ऐसे ही आएंगे। (..हम भी जाकर बैठ गए!)
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