पता नहीं कैसे लोग भगवान जी को सोने का मुकुट आदि अर्पित करतेे हैं और भारी भरकम रकम का गुप्तदान। हमारा तो कोई दस-बीस का ज़्यादा पुराना नोट कहीं चल न रहा हो तो ही दान-पेटिका में..। चलो, यह तो भक्त और भगवान के बीच की बातें हैं -- इंसानों के बीच क्या हो रहा है? कहते हैं, गुप्त दान सर्वश्रेष्ठ है। पर हम सब तो प्रायः किया कराया गा देते हैं। करते भी किसी के लिए कुछ तब हैं जब ठोक-बजा के देख लें कि यह सचमुच दया का पात्र है भी और इसको कुछ दिए का पुण्य फल खुद को मिलेगा भी। अबकि अपने जन्मदिन पर नजदीकी चौक पर अक्सर मिलते एक फटेहाल लड़के को पाजामा-कुरता दे आए थे। पर उसे कभी वह पहने ही नहीं देखा तो एक बार पूछ भी लिया: बेच दिया? वह बोला: अच्छे कपड़ों में कौन भीख देगा.. भिखारी लगना भी तो जरुरी है! लगा जैसे सच कह रहा हो.. "आप भी जब-तब रोते रहे कि रिटायर्ड लोगों की तो कोई सुनता नहीं; उस ऑफिस में तो हमें कोई जानता नहीं; न टिकट बन पाता, न रिफंड मिल पाता.. तो एकाध लोगों ने आपकी सुन ली.. एक मोहतरमा ने तो अपने ऑफिस ही मदद करने को बुला डाला (यानि कि उसे आप सचमुच दया के पात्र लगे); और जब आपने ढिंढोरा पीट दिया कि अमुक को तो हम यहां से, फलां को वहां से जानते हैं तो उन मोहतरमा ने भी दरवाज़ा बंद कर लिया -- "चल हट!"
Wednesday, 22 March 2017
"चल हट!"
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