तस्वीर बनाता हूं..
एक तस्वीर-सी दिल में बनती है! जी हां, जिसे कभी देखा न हो, सिर्फ सुनी हों उनकी बातें, या पढ़ी हों उनकी लिखी पंक्तियां.. मैं तो लिखावट देखकर भी किसी की तस्वीर मन में बना लेता हूं। अब तक का तो अनुभव यही रहा कि कभी ऐसे दोस्त से मिलने पर वह दूर-दूर तक भी उस तस्वीर के करीब नहीं थे। आपने भी कभी ऐसा अनुभव किया हो तो फिक्र न करें। आप जो उन्हें प्रत्यक्ष देख रहे हैं, वह उनकी भौतिक तस्वीर है; जो आपके अंतर्मन ने उनकी तस्वीर बनाई है, वह उनके व्यक्तित्व की, उनकी अंदरूनी तस्वीर है -- अधिक सजीव। उन्होंने भी आपकी ऐसी अंदरुनी तस्वीर बनाई होगी.. उसीको अधिक महत्व दें। लेकिन इतना आसान भी नहीं यह तस्वीर बनाना।
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