Thursday, 23 March 2017

अलविदा!

"क्या मैं.." अभी फोन पर किसी का नाम भी नहीं लिया था कि जवाब मिल गया, " सीट पर नहीं हैं"। पता नहीं क्यों, 'मार्च-एंड' में बाबू वर्ग, छोटे-मोटे लेखक और घोड़े बिदके-बिदके रहते हैं। शायद 'एनुअल क्लोज़िंग' पर काम का बोझ बढ़ जाता है। लेखक इसलिए बिदके होते हैं कि कलम ज़्यादा घिस गई, मेहनताना उतना नहीं मिला। हम क्यों बिदक रहे हैं? हमारा भी यह 'क्लीनज़िंग वीक' चल रहा है। सुबह-शाम और हर तीज-त्यौहार पर हम जो शुभ-कामनाओं की 'बल्क-पोस्टिंग' करते रहे और बदले में किसी ने एक स्माइली भी नहीं भेजी.. बस, उनकी लिस्ट बना रहे हैं। ..कब तक ऐसे लोगों को सहते रहें जो हमारे 'आधा-भरे' गिलास को हमेशा 'आधा-खाली' ही कहते हैं। हमारी छोटी रेखा के साथ अपनी बड़ी लाइन खीँच कर हमें छोटा बना जाते हैं। ऐसी नेगेटिविटी की वार्षिक सफाई भी आवश्यक है। मार्च में घोड़े क्यों बिदकते हैं - गूगल पर यह देखने का आपके पास समय है - हमे एक स्माइली भेजने का नहीं!.. एक झाड़ू आर्डर की थी। शायद आ गई!

                   ..कभी अलविदा न कहना

No comments:

Post a Comment