Tuesday, 31 October 2017

बिल्ली जंक्शन!

बिल्ली जंक्शन!

जिस तरह से पहलवानों का अखाड़ा, ठाकुरों की हवेली या डरपोकों का घर (हमारा) नाम चलन में आ गए, ऐसे ही भगत की कोठी, राय का बाग आदि रेलवे स्टेशनों का नामकरण हुआ होगा। रेलवे के लगभग 8500 स्टेशनों के नामों के अतीत की भी कई रोचक कहानियां होंगी। कोई ऐसा विकिपीडिया अभी तक तो नहीं मिला, शायद भविष्य में कभी मिल जाए। अब दिल्ली का इतिहास तो काफी कुछ पढ़ा है, "बिल्ली" के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई। जी हां, 'बिल्ली जंक्शन' स्टेशन धनबाद क्षेत्र में है। इसी तरह 'काला बकरा' ( जालंधर, पंजाब), 'भैंसा' (मथुरा), 'चिंचपोकली' (मुम्बई) आदि कई रोचक नाम हैं। आत्मीयता दर्शाते भी अनेक स्टेशन हैं - 'सहेली' (भोपाल), 'रानी' (अजमेर), 'साली' (जयपुर),  'बाप' (जोधपुर), 'ओजनिया चाचा' (जैसलमेर) तथा 'नाना' (पाली जिला) आदि। आंध्र प्रदेश के निम्नलिखित स्टेशन को ठीक से लिखने-बोलने वाले को तो लोहानी साहब पुरुस्कृत भी कर सकते है --
"VENKATANARASIMHARAJUVARIPETA"!

Tuesday, 17 October 2017

'ब्लड क्लॉट'

कभी लोहानी जी बुलाएंगे तो जरूर सीधा रेल भवन तक का ही ऑटो करूंगा। वरना तो अब ऑटो वाले भी हमारा 'इकॉनमी ड्राइव' समझने लगे हैं। पेंशन के अभाव में अब इस तरह का मोलभाव करना पड़ता है: 'मेट्रो स्टेशन चलोगे? मीटर में पचास रुपए आने पर उतार देना।' (आगे पैदल!) कुछ ऐसी ही माथापच्ची मेडिकल इंश्योरेंस के लिए करनी पड़ रही है। दस हजार प्रीमियम पर दो लाख का कवर। वो ज़्यादा के लिए कह रहे हैं कि एक छोटा-सा 'ब्लड क्लॉट' ही दो लाख खर्च करा देगा.. स्टेंट अलग। "..तो एकाध स्टेंट कम डलवा लेंगे!"  वह समझ ही नहीं रहे। ..तभी किसी को देखने अपोलो जाना पड़ गया। एक संबंधी का लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था। डोनर उन्हीं की पत्नी थीं जिन्हें एक सप्ताह बाद छुट्टी दी जा रही थी। उनके पति को अभी दस दिन और हस्पताल में रहना है। जहां उनकी इस दशा ने मन को झकझोर दिया, वहीं महिला के प्रति मन श्रद्धा से नतमस्तक हो गया। बातों-बातों में पता चला कि बड़ी सिफारिश पर वहां दाखिला मिल पाया -- कुल 22 लाख के खर्चे पर। अन्य हस्पतालों में यह 'पैकेज' 35 लाख का सुनने में आया। किसी को विपदा में देखकर मानव मन स्वयं उस स्थिति में कल्पना करने लग जाता है। हम तो अभी दस हजार के प्रीमियम पर ही नाप-तोल कर रहे थे। अब तो मन ऐसा बावला हुआ कि घर आते ही भगवान की मूर्ति के पांव पकड़ लिए कि -- "दोनों समय गीता पढूंगा.. मैं नहीं कर सकता इतना सब कुछ.. आप ही बचा लो.. मुझे नहीं लेना कोई इंश्योरेंस.. मुझे नहीं डलवाने स्टेंट्स.. कहीं दिल-दिमाग की किसी नस में कोई ब्लड-क्लॉट आ जाए तो आप ही फूंक मार देना!".. भगवान जी ने व्यंग किया: "मेरी एक फूंक से तो सारी सृष्टि हिल जाएगी.. किसी इमरजेंसी में तो सीएमडी साहब ही एक फोन कर देंगे.. अब तो फेसबुक-फ्रेंड भी हैं.. कल ही तो इतरा रहा था!" .. जब अंत तक हमने भगवान के चरण नहीं छोड़े तो यह निर्णय हुआ कि भले ही हम दस हजार प्रीमियम की मेडिकल पॉलिसी न लें, पर जन्माष्टमी पर मंदिर में चढ़ाए दस रुपये के खोटे सिक्के के बदले अपना सारा खोटापन छोड़ ईश्वर के ही सच्चे नाम का आश्रय लेंगे। बहुत डराता है यह -- ब्लड क्लॉट!

Sunday, 8 October 2017

मधुर स्मृति!

कुछ ही पलों में जहां विमान बादलों में छुप जाता है तो बच्चों का कुतूहल भी समाप्त हो जाता है, वहीं रेलगाड़ी से जुड़ी यादें बरसों बाद भी याद रहती हैं। सन 1957-58 में पटियाला स्टेशन की रेल लाइन पर मानो मैंने किसी सफेद 'परी' को देख लिया हो! कल यह पोस्ट लिखते हुए, अचानक उसका नाम भूल जाने पर मन इतना परेशान हो गया की 'गूगल सर्च' का सहारा लेना पड़ा। तब भी बात नहीं बनी तो रात साढ़े ग्यारह बजे आयरलैंड की एक मिलती-जुलती तस्वीर लोहानी साहब को भेजकर परेशान कर दिया कि सर, बताइए, इसे क्या कहते हैं? ..जी, हां --'ट्राम' (Tram)!.. किसी रेलगाड़ी में उलटा इंजन लगा आ जाना तो हम बच्चों के लिए एक बड़ी बात थी। चार बजे वाली गाड़ी लेकर आता उलटा इंजन हमारे स्टेशन पर पानी 'पीने' भी जरूर जाता था। प्लेटफॉर्म पर पार्सल वैन से जब कभी हम फिल्मों की रीलें उतरतीं देखते तो कालोनी में फिल्म दिखाए जाने का ढिंढोरा पीट देते। दो आंखें बारह हाथ, तूफान और दीया, चलती का नाम गाड़ी जैसी कई फिल्में हमनें देखीं। ग्राउंड के बीच पर्दा लगाकर प्रोजेक्टर पर रीलें बदल-बदल कर चलाई जातीं। एक बार किसी ने कहा: 'यह चलाना सीखना चाहिए।' असिस्टेंट स्टेशन मास्टर मदान साहब ने जवाब दिया था, 'चलाना नहीं, बनाना सीखो।' मेरा मन करता था, पर्दे के पीछे जाकर देखें कि क्या पीछे भी ऐसा दीखता है।  अब तो, बस, यादें दिखाई देती हैं!

बड़ी देर से आए हैं!

बड़ी देर से आए हैं..

आखिर क्या है ऐसा श्री अश्वनी लोहानी की शख्सियत में कि हम एयरलाइन्स की टीम छोड़कर रेलवे टीम में आ गए! यूं तो उनसे बरसों पहले ही मिलना हो जाता। 1972 में ही रेलवे के असिस्टेंट स्टेशन मास्टर का एग्जाम पास किया था। इंटरव्यू में हॉबी के बारे में पूछने पर मैंने कहा 'कविताएं लिखना'। वह बोले, 'आपकी हॉबी तो बहुत सॉफ्ट है, रेलवे की नौकरी बहुत कठिन (सो, रिजेक्टेड)!' चार साल बाद एयर इंडिया के इंटरव्यू में भी यही पूछा गया। पिछले इंटरव्यू से सबक लेते हुए बोल दिया, 'बागबानी!' उनकी नज़रें कह रही थीं, 'मतलब लिखने-पढ़ने से कोई नाता नहीं (रिजेक्टेड)!' फिर छह साल बाद इंडियन एयरलाइन्स में अंत में भी यही सवाल पूछा गया। "..सुबह बागबानी, शाम को लिखना!" सलेक्टेड! ऐसे ही तीस साल बीत गए। ..अब लोहानी साहब का व्यक्तित्व फिर उधर खींच रहा है। वैसे भी रेलगाड़ी की अनेकों यादें हर किसी से जुड़ीं हैं। पिताजी 1968 में और बड़े भाई 1994 में रेलवे से रिटायर हुए थे। बड़ी देर से आए हैं, प्यार का तोहफा लाए हैं!

Shri Ashwani Lohani liked it within minutes!

'बॉम्बे इंजन'

सन 1957 में पिता जी करनाल रेलवे स्टेशन पर टिकट बाबू थे, बड़े भैया चंदौसी में तार बाबू की ट्रेनिंग कर रहे थे.. मैं तब रेलवे क्वार्टर के बाहर खड़ा आती-जाती रेलगाड़ियां देखता रहता। 'फ्लाइंग एक्सप्रेस' तब वहां नहीं रुकती थी। हम सब बच्चे इसकी तेज रफ्तार से बहुत डरते थे। पता नहीं क्यों इसके गोलमटोल इंजिन को हम 'बॉम्बे इंजन' कहते थे। अक्सर एक आर्मी ट्रक उधर से गुजरता। हम बच्चों के हाथ हिलाने पर वह रुक जाता। कुछ जवान हमें उसमें बिठाते और पास ही रेलवे फाटक पर उतार देते। हम वहां से वापस घर भाग आते। फाटक बंद होने पर समझ जाते कि कोई रेलगाड़ी आएगी -- उसकी प्रतीक्षा करते और 'बाय' करते। एक बार पिता जी को दफ्तर के जरूरी काम से लखनऊ जाना था। किसी गाड़ी का समय नहीं था। एक अकेला इंजन जा रहा था। वह उसीमें चले गए थे। ऐसी अजीब बात तो याद रहेगी ही। जाते हुए उन्होंने प्लेटफॉर्म के स्टाल से मुझे एक आने का एक केक भी दिलाया था। और लौटने पर मेरे लिए एक ट्रायसिकल भी लाए थे। करनाल से हम पटियाला चले गए थे और 1962 में दिल्ली आए। करनाल होते हुए पटियाला घूम आने का बहुत मन है।

Friday, 6 October 2017

"भोलू गार्ड"

भारतीय रेल के मस्कट "भोलू" गार्ड को देखकर गार्ड बाबू बड़े भैया की याद आ जाती है। अब भी रात में सिरहानेे टॉर्च रख कर सोते हैं। कभी रात में आंख खुलने पर, फर्श पर पांव रखने से पहले, टॉर्च जलाकर पता नहीं क्या देखते हैं। एक बार पूछ ही लिया। .."रेलवे ट्रेनिंग में सिखाया गया था कि रात में कहीं ट्रेन के रुक जाने पर नीचे उतरने से पहले टॉर्च जलाकर जरूर देख लें कि ट्रेन किसी पुल पर तो नहीं रुकी हुई.. वही आदत पड़ गई 37 साल की नौकरी में!" भोलू निडरता का भी प्रतीक है -- भैया भी। कभी जब उनकी गुड्स-ट्रेन काफी देर बीच जंगल में ही रुकी रहती तो वह नीचे उतर कर इंजिन ड्राइवर से ही इसका कारण पूछने चल देते थे। इंजिन की कूक और गार्ड की झंडी ही तब परस्पर बातचीत का साधन थे। भारतीय रेल अब अपने 164 स्वर्णिम वर्ष पूर्ण कर चुकी है। गार्ड भैया भी इस अवधि की आधी स्मृतियां तो मन में संजोए ही हैं!