Sunday, 8 October 2017

बड़ी देर से आए हैं!

बड़ी देर से आए हैं..

आखिर क्या है ऐसा श्री अश्वनी लोहानी की शख्सियत में कि हम एयरलाइन्स की टीम छोड़कर रेलवे टीम में आ गए! यूं तो उनसे बरसों पहले ही मिलना हो जाता। 1972 में ही रेलवे के असिस्टेंट स्टेशन मास्टर का एग्जाम पास किया था। इंटरव्यू में हॉबी के बारे में पूछने पर मैंने कहा 'कविताएं लिखना'। वह बोले, 'आपकी हॉबी तो बहुत सॉफ्ट है, रेलवे की नौकरी बहुत कठिन (सो, रिजेक्टेड)!' चार साल बाद एयर इंडिया के इंटरव्यू में भी यही पूछा गया। पिछले इंटरव्यू से सबक लेते हुए बोल दिया, 'बागबानी!' उनकी नज़रें कह रही थीं, 'मतलब लिखने-पढ़ने से कोई नाता नहीं (रिजेक्टेड)!' फिर छह साल बाद इंडियन एयरलाइन्स में अंत में भी यही सवाल पूछा गया। "..सुबह बागबानी, शाम को लिखना!" सलेक्टेड! ऐसे ही तीस साल बीत गए। ..अब लोहानी साहब का व्यक्तित्व फिर उधर खींच रहा है। वैसे भी रेलगाड़ी की अनेकों यादें हर किसी से जुड़ीं हैं। पिताजी 1968 में और बड़े भाई 1994 में रेलवे से रिटायर हुए थे। बड़ी देर से आए हैं, प्यार का तोहफा लाए हैं!

Shri Ashwani Lohani liked it within minutes!

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