कभी लोहानी जी बुलाएंगे तो जरूर सीधा रेल भवन तक का ही ऑटो करूंगा। वरना तो अब ऑटो वाले भी हमारा 'इकॉनमी ड्राइव' समझने लगे हैं। पेंशन के अभाव में अब इस तरह का मोलभाव करना पड़ता है: 'मेट्रो स्टेशन चलोगे? मीटर में पचास रुपए आने पर उतार देना।' (आगे पैदल!) कुछ ऐसी ही माथापच्ची मेडिकल इंश्योरेंस के लिए करनी पड़ रही है। दस हजार प्रीमियम पर दो लाख का कवर। वो ज़्यादा के लिए कह रहे हैं कि एक छोटा-सा 'ब्लड क्लॉट' ही दो लाख खर्च करा देगा.. स्टेंट अलग। "..तो एकाध स्टेंट कम डलवा लेंगे!" वह समझ ही नहीं रहे। ..तभी किसी को देखने अपोलो जाना पड़ गया। एक संबंधी का लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था। डोनर उन्हीं की पत्नी थीं जिन्हें एक सप्ताह बाद छुट्टी दी जा रही थी। उनके पति को अभी दस दिन और हस्पताल में रहना है। जहां उनकी इस दशा ने मन को झकझोर दिया, वहीं महिला के प्रति मन श्रद्धा से नतमस्तक हो गया। बातों-बातों में पता चला कि बड़ी सिफारिश पर वहां दाखिला मिल पाया -- कुल 22 लाख के खर्चे पर। अन्य हस्पतालों में यह 'पैकेज' 35 लाख का सुनने में आया। किसी को विपदा में देखकर मानव मन स्वयं उस स्थिति में कल्पना करने लग जाता है। हम तो अभी दस हजार के प्रीमियम पर ही नाप-तोल कर रहे थे। अब तो मन ऐसा बावला हुआ कि घर आते ही भगवान की मूर्ति के पांव पकड़ लिए कि -- "दोनों समय गीता पढूंगा.. मैं नहीं कर सकता इतना सब कुछ.. आप ही बचा लो.. मुझे नहीं लेना कोई इंश्योरेंस.. मुझे नहीं डलवाने स्टेंट्स.. कहीं दिल-दिमाग की किसी नस में कोई ब्लड-क्लॉट आ जाए तो आप ही फूंक मार देना!".. भगवान जी ने व्यंग किया: "मेरी एक फूंक से तो सारी सृष्टि हिल जाएगी.. किसी इमरजेंसी में तो सीएमडी साहब ही एक फोन कर देंगे.. अब तो फेसबुक-फ्रेंड भी हैं.. कल ही तो इतरा रहा था!" .. जब अंत तक हमने भगवान के चरण नहीं छोड़े तो यह निर्णय हुआ कि भले ही हम दस हजार प्रीमियम की मेडिकल पॉलिसी न लें, पर जन्माष्टमी पर मंदिर में चढ़ाए दस रुपये के खोटे सिक्के के बदले अपना सारा खोटापन छोड़ ईश्वर के ही सच्चे नाम का आश्रय लेंगे। बहुत डराता है यह -- ब्लड क्लॉट!
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