कुछ ही पलों में जहां विमान बादलों में छुप जाता है तो बच्चों का कुतूहल भी समाप्त हो जाता है, वहीं रेलगाड़ी से जुड़ी यादें बरसों बाद भी याद रहती हैं। सन 1957-58 में पटियाला स्टेशन की रेल लाइन पर मानो मैंने किसी सफेद 'परी' को देख लिया हो! कल यह पोस्ट लिखते हुए, अचानक उसका नाम भूल जाने पर मन इतना परेशान हो गया की 'गूगल सर्च' का सहारा लेना पड़ा। तब भी बात नहीं बनी तो रात साढ़े ग्यारह बजे आयरलैंड की एक मिलती-जुलती तस्वीर लोहानी साहब को भेजकर परेशान कर दिया कि सर, बताइए, इसे क्या कहते हैं? ..जी, हां --'ट्राम' (Tram)!.. किसी रेलगाड़ी में उलटा इंजन लगा आ जाना तो हम बच्चों के लिए एक बड़ी बात थी। चार बजे वाली गाड़ी लेकर आता उलटा इंजन हमारे स्टेशन पर पानी 'पीने' भी जरूर जाता था। प्लेटफॉर्म पर पार्सल वैन से जब कभी हम फिल्मों की रीलें उतरतीं देखते तो कालोनी में फिल्म दिखाए जाने का ढिंढोरा पीट देते। दो आंखें बारह हाथ, तूफान और दीया, चलती का नाम गाड़ी जैसी कई फिल्में हमनें देखीं। ग्राउंड के बीच पर्दा लगाकर प्रोजेक्टर पर रीलें बदल-बदल कर चलाई जातीं। एक बार किसी ने कहा: 'यह चलाना सीखना चाहिए।' असिस्टेंट स्टेशन मास्टर मदान साहब ने जवाब दिया था, 'चलाना नहीं, बनाना सीखो।' मेरा मन करता था, पर्दे के पीछे जाकर देखें कि क्या पीछे भी ऐसा दीखता है। अब तो, बस, यादें दिखाई देती हैं!
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