Sunday, 8 October 2017

'बॉम्बे इंजन'

सन 1957 में पिता जी करनाल रेलवे स्टेशन पर टिकट बाबू थे, बड़े भैया चंदौसी में तार बाबू की ट्रेनिंग कर रहे थे.. मैं तब रेलवे क्वार्टर के बाहर खड़ा आती-जाती रेलगाड़ियां देखता रहता। 'फ्लाइंग एक्सप्रेस' तब वहां नहीं रुकती थी। हम सब बच्चे इसकी तेज रफ्तार से बहुत डरते थे। पता नहीं क्यों इसके गोलमटोल इंजिन को हम 'बॉम्बे इंजन' कहते थे। अक्सर एक आर्मी ट्रक उधर से गुजरता। हम बच्चों के हाथ हिलाने पर वह रुक जाता। कुछ जवान हमें उसमें बिठाते और पास ही रेलवे फाटक पर उतार देते। हम वहां से वापस घर भाग आते। फाटक बंद होने पर समझ जाते कि कोई रेलगाड़ी आएगी -- उसकी प्रतीक्षा करते और 'बाय' करते। एक बार पिता जी को दफ्तर के जरूरी काम से लखनऊ जाना था। किसी गाड़ी का समय नहीं था। एक अकेला इंजन जा रहा था। वह उसीमें चले गए थे। ऐसी अजीब बात तो याद रहेगी ही। जाते हुए उन्होंने प्लेटफॉर्म के स्टाल से मुझे एक आने का एक केक भी दिलाया था। और लौटने पर मेरे लिए एक ट्रायसिकल भी लाए थे। करनाल से हम पटियाला चले गए थे और 1962 में दिल्ली आए। करनाल होते हुए पटियाला घूम आने का बहुत मन है।

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