Friday, 8 September 2017

'आपके वाले' सीएमडी

"नाना जी, मैं छोटी 'सीएमडी' लग रही हूं न?" लोहानी साहब जैसा चश्मा लगा कर मेरी नातिन ने पूछा। मैं समझ गया, मेरा आधा-अधूरा ब्लॉग पढ़ कर अब तो यह छुटकी सवालों की ऐसी झड़ी लगा देगी कि एक कहानी ही बन जाएगी। -- नाना जी, क्या सीएमडी के छोटे-छोटे पंख होते हैं.. फिर वह इतने सारे जहाजों को कैसे देखते होंगे.. क्या वह उड़ते ही रहते हैं.. जमीन पर उनके पांव नही टिकते.. फिर तो वह किसी से मिलते भी नहीं होंगे.. बस, घर से जहाज में बैठे.. इधर-उधर घूमे, मतलब उड़े, और शाम को घर की छत पर उतर गए!.. फिर लोहानी साहब आपको कहां मिले.. वह "उड़ने वाले" सीएमडी क्यों नही थे.. क्या वह "माई फ्रेंड गणेशा" की तरह किसी गुफा में रहते थे.. और किसी के भी बुलाने पर झट आ जाते थे.. किसी को देखने हॉस्पिटल भी चले जाते थे.. सबकी मदद को तैयार रहते थे.. मैंने आपका मोबाइल देखा -- वो तो आपके मैसेज का जवाब भी देते थे.. "वह जमीन से और एक आम आदमी से जुड़े थे" इसका क्या मतलब हुआ?..आपको अपने कई सीएमडी के नाम भी याद नहीं.. फिर लोहानी साहब को क्यों सब लोग इतना प्यार करते हैं.. "पहाड़ पर चढ़ने वाला झुक कर चलता है, नीचे उतरने वाला अकड़ कर चलता है.." यह भी समझ नहीं आया.. अच्छा, अब मैं समझी-- "आपके वाले" सीएमडी "माई फ्रेंड गणेशा" की तरह थे--लाखों में एक!

("Touched I am!" Mr. Ashwani Lohani comments)

Friday, 1 September 2017

रामायण: आनुषंगिक कथाएं

सीता-राम के विवाह से पूर्व एक रोज़ राजा जनक के दरबार में एक भोज का आयोजन था। विविध पकवान परोसे जा रहे थे। जैसे ही राजा जनक ने खीर खाना आरम्भ किया, सीता जी की नज़र उनके खीर के पात्र में एक तिनके पर पड़ी। भरी सभा में कुछ कहना उन्हें उचित नहीं लगा और न ही वह उसे अनदेखा कर सकती थीं। तभी उन्होंने एकटक उस तृण को देखा। अगले ही क्षण वह जल कर खीर के पात्र के एक किनारे चिपक गया। राजा जनक ने यह सब होते हुए देख लिया। सभा समाप्ति पर उन्होंने अपनी पुत्री से कहा, "मैं जान गया कि आप भगवती स्वरूपा हैं; किंतु कभी अपनी शक्ति का प्रयोग किसी के अहित में नहीं करना।" अशोक वाटिका में रावण के आने पर सीता जी का हाथ में एक तृण पकड़े रहना अपने पिता की इसी बात को स्मरण रखना था अन्यथा रामकथा ही बदल जाती। कुछ लोगों का इसे डूबते को तिनके का सहारा कहना नितांत हास्यास्पद है। सीता जी को स्पर्श कर पाना ही असंभव था; फिर उनका हरण कैसे हुआ। इस संबंध में भी एक कथा का प्रसंग है। वनवास के समय एक रोज़ लक्ष्मण जी की अनुपस्थिति में श्री राम ने सीता जी को अग्निदेव के संरक्षण में सौंपा और तत्पश्चात वह उनका प्रतिबिंब मात्र रहीं। रावणवध के पश्चात तथाकथित अग्नि परीक्षा का आशय भी अग्निदेव से सीता जी को वापस लेना था। लक्ष्मण जी का क्रोध देखकर उस समय ही श्री राम ने उन्हें वास्तविकता से अवगत कराया था।

Friday, 25 August 2017

ॐ गं गणपतये नमः


गणेश चतुर्थी को गणेशजी का प्राकट्य दिवस माना जाता है। यह पर्व अनंत चतुर्दशी तक मनाया जाता है (इस वर्ष 25 अगस्त - 5 सितम्बर 2017)। आज गणेश जी की प्रतिमा की स्थापना का शुभ मुहूर्त दोपहर 12 से 1:30 बजे तक है। घर में स्थापना हेतु पीले अथवा लाल रंग (रक्त वर्ण) की मध्यम आकार की प्रतिमा ही उपयुक्त मानी जाती है। प्रायः लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछा कर उन्हें स्थापित किया जाता। घी का दीपक जला कर उन्हें मोदक (लड्डू) का भोग लगाया जाता है और दूर्वा (दूब घास के कौंपल) अर्पित किए जाते हैं। पुरानी कथाओं के अनुसार इस चतुर्थी का चंद्र-दर्शन शुभ नहीं माना जाता। अतः जो लोग इस दिन उपवास रखते हैं वे रात को चंद्रमा को अर्ध्य देते हुए नीची दृष्टि रखें। गणेश जी को कभी तुलसी की पत्तियां भी अर्पित नहीं की जातीं। कुछ अन्य रंग की गणेश प्रतिमाओं का वर्णन इस प्रकार मिलता है: नीले रंग और हरिद्रा (हल्दी) गणेश जी की प्रतिमा का पूजन विशेष कामनाओं के लिए; श्वेत वर्ण वाले ऋण-मोचन; एकदंत श्याम वर्ण वाले अद्भुत पराक्रम; चार भुजाओं रक्त वर्ण वाले संकष्टहरण गणेश माने जाते हैं। त्रिनेत्रधारी रक्तवर्ण के दस भुजाओं वाले "महागणपति" में उपरोक्त सभी का समावेश माना जाता है।

गणपति वंदन

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ:।
निर्विध्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥


Wednesday, 23 August 2017

'ब्लड क्लॉट'

बहुत डराता है यह ('ब्लड क्लॉट')!

29 फरवरी को जन्में लोग भी न, साठ साल की उम्र में भी पंद्रह साल के बच्चे जैसी बातें करते हैं। अब मेडिकल इंश्योरेंस का प्रीमियम इस उम्र में पच्चीस हजार सालाना तो बनेगा ही। इसी उलझन में थे कि इतना तो दे नहीं सकते, फिर पांच की बजाय तीन-साढ़े तीन लाख का इंश्योरेंस करा लेते हैं। तभी किसी को देखने अपोलो जाना पड़ गया। एक संबंधी का लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था। डोनर उन्हीं की पत्नी थीं जिन्हें एक सप्ताह बाद छुट्टी दी जा रही थी। उनके पति को अभी दस दिन और हस्पताल में रहना होगा। जहां उनकी इस दशा ने मन को झकझोर दिया, वहीं महिला के प्रति मन श्रद्धा से नतमस्तक हो गया। बातों-बातों में पता चला कि कहीं-कहीं की सिफारिश पर वहां दाखिला मिल पाया -- कुल 22 लाख के खर्चे पर। अन्य हस्पतालों में यह 'पैकेज' 35 लाख का सुनने में आया। कहते हैं किसी को विपदा में देखकर मानव मन तत्काल स्वयं की उस स्थिति में कल्पना करने लग जाता है। हम तो अभी 20-25 हजार के प्रीमियम पर ही नाप-तोल कर रहे थे। अब तो मन ऐसा बावला हुआ कि घर आते ही भगवान की मूर्ति के पांव पकड़ लिए कि -- "दोनों समय गीता पढूंगा.. मैं नहीं कर सकता इतना सब कुछ.. आप ही बचा लो.. मुझे नहीं लेना कोई इंश्योरेंस.. मुझे नहीं डलवाने स्टेंट्स.. कहीं दिल-दिमाग की किसी नस में कोई ब्लड-क्लॉट आ जाए तो आप ही फूंक मार देना!".. भगवान जी ने व्यंग किया: "मेरी एक फूंक से तो सारी सृष्टि हिल जाएगी.. किसी इमरजेंसी में तो एमडी साहब ही एक फोन कर देंगे.. अब तो फेसबुक-फ्रेंड भी हैं.. कल ही तो इतरा रहा था!" .. जब अंत तक हमने भगवान के चरण नहीं छोड़े तो यह निर्णय हुआ कि भले ही हम 20 हजार प्रीमियम की मेडिकल पॉलिसी न लें, पर जन्माष्टमी पर मंदिर में चढ़ाए 10-10 रुपये के दो खोटे सिक्कों के बदले अपना सारा खोटापन बदल कर ईश्वर के ही सच्चे नाम का आश्रय लेंगे।

Tuesday, 22 August 2017

क्यों न बिगड़े (नेताजी का बेटा)!

रिटायरमेंट के बाद पेंशन न होने पर ऐसी जली-कटी तो सुननी ही पड़ेंगी.. "काम के न काज के.. बताओ, सारी उम्र एक बेटे को भी अपनी कंपनी में नहीं घुसा सके!"..बस, ऐसे ही दिन कट रहे थे। कोई छोटी-मोटी तकलीफ होने पर घरेलू टोटकों से ही अपना इलाज कर खुश हो लेते थे कि चलो, डॉक्टर के दो-चार सौ बचा लिए -- 'मनी सेव्ड, मनी अर्नड'! साल के आखिर में यही सोच कर खुश हो लेते थे कि कोई हार्ट-वार्ट की बड़ी तकलीफ नहीं हुई.. चलो, एक-दो लाख बच गए!.. एक बार मैडम ने तबियत साफ कर दी, "तुम क्या समझ रहे हो, कुछ हो गया तो हम तुम्हें अपोलो ले जाएंगे?.. अपना जोड़-तोड़ कर कोई मेडिकल इंशोरेंस ले लो।" तब से बड़ी खर्चीली बीमारियों के भी घरेलू नुस्खें लिख रहे हैं। दफ्तर में भी हम ऐसे ही 'लो प्रोफाइल' थे। कई हमें 'राम जी की गाय' कहते तो कई कहते, "यह नेपोटिज़्म के उलटे हैं!" कोई सिफारिश थी नहीं। किसी कम्पटीशन में भी नहीं बैठते थे। बस, सब राम भरोसे!..  अब 18 अगस्त से राहू-केतु ने अपनी चाल क्या बदली, हमारी चाल में भी परिवर्तन आ गया। कंधे उचका कर चलने लगे। पार्क में चक्कर लगाते देख कई पूछते भी, "क्या किसी शेर से दोस्ती हो गई है?" बस, जैसे किसी ने आंखों पर रंगीन चश्मा लगा दिया हो -- सब हरा-भरा दिखाई देता था। कहां हम रितिक रोशन की गलत मेल आई-डी पर ही लिखते रहते थे कि अपनी बायोग्राफी के कुछ पेज हमसे भी लिखवा लो; अब खुद अपने सीएमडी साहब का फोन आने का इंतजार रहता है। बताइए, उनका इतना बड़ा सोशल सर्कल.. समझो, अपनी तो निकल पड़ी! एक बार तो पत्नीजी को भी सुना दिया, "तो तुम हमें सरकारी हस्पताल में पटकने जा रही थीं; अब देखो, उनके एक ही फोन से..!" पंडितजी ने सुना तो कहने लगे, खुशी के मौके पर कथा करा लो। हम तो, सच, फूले नहीं समाए जब कथा समाप्ति पर पंडितजी बोले, "..जैसे इनके दिन फिरे, भगवान सबके दिन फेरियो!" ..न, न.. घमंड तो अब भी हम में जरा नहीं आया था। अकड़ी गर्दन से ही सही, भजन वही गुनगुनाते रहते हैं: "करते हो तुम कन्हैया, मेरा नाम हो रहा है..!" अलबत्ता, कभी-कभार यह ख्याल मन में जरूर आ जाता है -- क्यों न बिगड़े नेताजी का बेटा जब हम ही इतना उछल रहे हैं.. सीएमडी साहब ने अभी फेसबुक फ्रेंडशिप ही मंजूर की है!..

Saturday, 19 August 2017

शुभाशीष!

बरसों बाद सन 1960 की "बम्बई का बाबू" देखी। मन था कुछ मधुर स्मृतियों में खो जाने का -- दिल ने पकड़ ली फिर वही एक चुभन जो जब-तब मैं यहां-वहां लिखता रहा। ..परिवार के पुश्तैनी आभूषण देख कर, घर की बेटी कहती है, "यह तो घर की बहू के लिए हैं.. मैं तो 'बाहर वाली' हूं!" इन करीब साठ साल में जमाना कहां से कहां पहुंच गया। नारी सशक्तिकरण के अनगिनत उदाहरण हमारे सामने हैं। नहीं गया तो एक शब्द -- "कन्यादान"-- नहीं गया! इससे पहले कि मुझ जैसे कुछ लोग हार मान लें.. एक बार, नारीशक्ति, तुम ही हुंकार लगा दो कि हम कोई वस्तु नहीं जो हमारा दान किया जाए.. शायद अभी भी अपने को पुरूष-प्रधान मानने वाला यह समाज तुम्हारी गर्जना से इस शब्द का कोई अन्य पर्याय ढूंढना आरम्भ कर दे। शायद पंडितों की कतार में कोई एकाध अपने बोर्ड पर लिखना शुरू कर दे: "हमारे यहां शादी में 'कन्यादान' शब्द प्रयोग नहीं किया जाता!"  ऐसे विवाहों के लिए अग्रिम शुभाशीष!..

Sunday, 6 August 2017

अधूरा मुहावरा!

एक बार बचपन में हम माँ का लाड़-प्यार देखने को दो-चार घंटे को गायब हो गए थे। बहुत ढूंढ़ेर मचने पर जब प्रकट हुए तो माँ ने "मेरा लाल, मेरा पीला" आदि कहकर बहुत लाड़ किया कि कहां चला गया था; मेरी तो जान ही निकल गई थी! हमने भी सच-सच बता दिया कि एक मुहावरा पढ़ा था जो असल में देखना था कि बेटे के दूर जाने पर माँ क्या सचमुच बहुत रोती है..! तब तो कपडे धोने की थापी से हमारी वो धुलाई हुई कि, कम्बख्त, पूरा मुहावरा तो पढ़ जाता: 'पहले माँ रोती बहुत है, फिर धोती बहुत है।' अभी मरहम-पट्टी शुरू ही हुई थी कि आवाज़ आई: अभी रुक जाओ, मैं भी जरा निपट लूं इस छोरे से!..