गोलू की गुल्लक में जब-तब मां दस का नोट दाल देतीं और कहतीं, 'लक्ष्मी जी दे गयीं हैं!' गोलू जब-तब लक्ष्मीजी की तस्वीर को निहारता रहता। दिवाली पर मां सौ का नोट डाल देतीं और लक्ष्मी जी की कहानियां सुनातीं कि किस तरह वह दिवाली की रात अच्छे लोगों को धन बांटने निकलती हैं। धीरे-धीरे गोलू तक यहां-वहां से चोर, राक्षशों और आसुरी शक्तियों की कहानियां भी पहुंचने लगीं। एक दिन मां ने देखा, वह हनुमान जी की पूजा करने लगा। ..अपने लिए नहीं -- लक्ष्मी जी की 'सुरक्षा' के लिए! 'वह इतनी सौम्य-सुंदर हैं; दिवाली पर अमावस की रात, वह अकेली ही इतने सारे धन-आभूषण के साथ यहां-वहां जाती हैं; उनके पास कोई हथियार भी नहीं होता!' एक रात हनुमान जी उसके सपने में आए तो भी उसने कहा, 'आप लक्ष्मी जी की रक्षा में क्यों नहीं रहते?' वह बोले, 'मैं लक्ष्मी जी की क्या रक्षा करूं वह तो स्वयं मेरी और हम सबकी रक्षा करती हैं!' पर बाल हठ के आगे उन्हें कहना ही पड़ा, 'ठीक है, कहीं आते-जाते मैं उनके साथ रहा करूंगा!' और सुबह उठने पर गोलू खूब खुश था। शायद यह कृतज्ञता का भाव ही सच्ची पूजा है। हम लोगों की तो भगवान से शिकायतें ही अधिक रहती हैं।
Monday, 26 June 2017
Friday, 23 June 2017
पंडितजी की तलाश में!
कइयों ने कहा कि अगर लड़के वाले अपना पंडित ला रहे हैं तो चुप रहो; अपना पंडित ढूंढने का मतलब कम-से-कम इक्कीस हज़ार पंडित जी के; 9 ग्रह, 27 नक्षत्र के सौ-सौ, पांच हज़ार गौ दान, ये दान, वो दान; बेटी की विदाई के साथ पंडितों की विदाई अलग.. बहुत चूना लग जाएगा!.. जिस तरह हिरणों के झुण्ड में सिंह अकेले चला जाता है, वैसे ही हम होम-वर्क करके पंडित-कॉलोनी में घूम रहे थे। बिना बताए कि हम लड़की के पिता हैं, हमने एक आचार्य से पूछा कि विवाह में किस पक्ष के पंडित की प्रधानता मानी जाती है। उन्होंने भली प्रकार समझाया कि विवाह-मंडप पर वधू का अधिकार है जिसका आयोजन उसके माता-पिता ने किया है। जब तक विवाह संपन्न नहीं हो जाता, वर पक्ष के सभी लोग उनके अतिथि हैं। अतः वधू पक्ष के पंडित की विवाह में प्रधानता है। वर पक्ष का भी पंडित उपस्थित होने पर मंत्रोच्चारण आदि दोनों सम्मिलित रूप से कर लेते हैं। आचार्य जी का "पैकेज" इक्कतिस हज़ार का जान कर हम लौटने लगे तो उन्होंने हमारा बजट पूछा और कम बजट के पंडित जी की उपलब्धता का भी संकेत दिया। तब हमने अपने होम-वर्क की कॉपी उनके सम्मुख खोल दी: नेट पैकेज ग्यारह हज़ार। अलग से कोई 'विदाई' आदि नहीं। दस हज़ार फेरे समाप्ति पर और दस-दस के नोट की एक गड्डी यानि एक हज़ार पहले जो ग्रह-नक्षत्र तथा अन्य दान आदि के लिए पंडित जी प्रयोग करते रहेंगे (हम बार-बार जेब में हाथ नहीं डालेंगे)। वर पक्ष के पंडित होने पर उनसे ताल-मेल बनाए रखेंगे। वर पक्ष अपनी इच्छा से कुछ दे अथवा न दे, उनसे कुछ नहीं कहेंगे। इसी प्रकार हम उनके पंडित को क्या दे रहे हैं, यह हमारी इच्छा पर निर्भर है। यह सब जानने के बाद आचार्य जी ने एक पंडित को बुला कर हमारा लेन-देन समझाया। छोटे पंडित जी कुछ यूं मुस्काए कि लूटने के सभी दरवाज़े तो हम बंद कर आए हैं। -- "अपनी स्कूटी पे आएंगे, 101/- तो एक्स्ट्रा दे दीजियो!" --"202/- ले लीजियो.. बस, "कन्यादान" का नाम न लीजियो!" (हमें 'कन्यादान' शब्द स्वीकार्य नहीं है और हम इसका मान्य पर्याय ढूंढते रहते हैं।)
Monday, 19 June 2017
'बाय'
सच है -- हर नया मौसम पुरानी याद लेकर आएगा! कल की यात्रा ने 1969 के वो दिन याद दिला दिए जब बड़े भैया जोधपुर में थे। उनके मकान की छत से मैं अपने पचास रुपये के क्लिक कैमरे से स्टेशन के पार्श्व भाग में दीख रहे किले की फोटो लिया करता था। किले में ही देवी का मंदिर है। मानते हैं कि कई युद्ध में उन्होंने नगर की सुरक्षा की। मैं भी तब छत पर आकर उनसे कुछ मांगा करता था। दिल्ली से चलने पर दरवाज़े की ओट से उसने मुझे 'बाय' भी किया था। मैं भी जोधपुर से एक तीन रुपये का सुंदर-सा फिरोज़ी रंग का रुमाल ले गया था। कहते हैं, किसी को रुमाल गिफ्ट नहीं करते। ऐसा क्या? शायद इसीलिए बात नहीं बनी। संस्मरण बन कर रह गए!
Saturday, 17 June 2017
कहां हो, आरुणि?
बरसों से उधर से गुज़रते वो देखते थे कि बांध में एक दरार-सी पड़ी है। रोज़ाना बढ़ती दरार ध्यान भी उनका ज़्यादा खींचने लगी। दिल में तो रहता था कि अंतर्मन कुछ कह रहा है। .. पर पहल कौन करे? अब पहल भी नहीं करनी कि हर कोई पास पड़े एक-दो पत्थर ही दरार से सटाता रहे, और अंतर्मन को भी समझाना है.. फिर तो यही रास्ता बचता है कि कम-से-कम मूक दर्शक बन कर भीड़ ही जमा कर लो। उसमें तो हम सब माहिर हैं ही। जैसे किसी दुर्घटना में ज़्यादातर लोग करते हैं। कोई-न-कोई भला मानस आ ही जाएगा भीड़ देख कर आगे बढ़ने को। आपको भी संतोष हो जाएगा कि अच्छा किया जो आप दो-चार लोग रुक गए, भीड़ बढ़ती गई और कोई आगे आ ही गया। नहीं तो यह सब कैसे संभव था। समय पर किसी की जान बच ही गई। वरना ऐसे हादसों में रेस्क्यू टीम कैसे पहुंचती! अब, भैया, हम लोग तो व्हाट्सएप आदि के जरिए ही सहायता सहानुभूति संदेश भेजने में माहिर हैं। गुरु-भक्त आरुणि की तरह बरसात में गुरु के खेत की टूटी मेढ़ देख कर वहीं लेट कर तो हम पानी का बहाव रोक नहीं सकते!..
Friday, 16 June 2017
'मुंहफट'
..वो तो रिक्शा खाली थी.. नहीं तो बात पहुंच गई थी थाने.. और अब जा पहुंची मंदिर!.. बस, घर आने से पहले मैडम को कुछ दूर कार चलाने की सूझी। स्टीयरिंग थामते ही चिपका दी सामने रिक्शा में। रिक्शा चालक बेचारा एक झटके से पीछे वाली सीट पर जा बैठा। उस पर भी मैडम का जवाब: "भैया, देख कर चला करो!" लेकिन इस बात का हमारे दिल पर इतना गहरा असर हुआ कि बेटी को जन्मदिन पर छोटी-मोटी कार दिलाने की जो सोच रहे थे, वो उसकी शादी तक पोस्टपोन कर दी थी कि दिल्ली की भीड़भाड़ में तो दिल नहीं मानता। रिक्शा वाली टक्कर के बाद मंदिर भी जाना शुरू तो कर दिया था पर वहां के कायदे-कानून से ज़्यादा वाकिफ नहीं थे। जैसे क्लास में बच्चे बीच-बीच में मास्टर जी से कुछ पूछते रहते हैं, वैसे ही पंडित जी के प्रवचन के दौरान हम हाथ खड़ा कर देते थे। नज़र मिलते ही पंडित जी अपने होठों पर अंगुली रख कर हमें चुप बैठे रहने का संकेत देते रहते थे। एक बार तो उन्होंने हमें 'मुंहफट' ही कह दिया था! बस, इतना पूछा था: 'पंडितजी आपको श्राद्ध के दिनों का ज़्यादा इंतज़ार रहता है या नवरात्रों का?' सालों बाद एक दिन प्रवचन के दौरान फिर हाथ खड़ा करने से हम खुद को नहीं रोक पाए जब वह बोल रहे थे: 'बेटी-दामाद को तो कितना भी देते रहो, पेट ही नहीं भरता।' ..बस, हम बोल पड़े: '..पर हमारी बेटी तो हमसे पहले से ही 'पेंडिंग' कार भी नही ले रही। दामाद जी भी कहते हैं कि अपनी किसी ज़रूरत के लिए पैसा रखो। अपनी बेटी के रूप में आपने सब दे दिया!' पंडित जी कहने लगे, 'संकल्प की हुई चीज तो देनी पड़ेगी, नहीं तो नरक-वरक..' डर के मारे हमने पास जाकर कोई उपाय पूछा कि संकल्प की हुई चीज़ किसी और को दे सकते हैं? पंडित जी ने बाद में मिलने को बोला है!..
Wednesday, 14 June 2017
सूरज
कई बार सालों लग जाते हैं जानने में कि वह मज़ाक था या असलियत। सातवीं-आठवीं क्लास तक तो हम होशियार बच्चों में आते थे। कभी गलत जवाब भी टीचर अनदेखा कर जाते थे। एक बार पूछा गया: "सूरज कौनसी संज्ञा है -- व्यक्तिवाचक, जातिवाचक या भाववाचक?" हमने कह दिया: "जातिवाचक।" टीचर जी बोले: "हां, सूरज 12 होते हैं!" इस छटपटाहट में 40 साल गुज़र गए। अब तो कोई सच बता दो!!
-- विजय के भटनागर, 'परिक्रमा'.ब्लॉग स्पॉट.कॉम
Tuesday, 13 June 2017
क्या यार!
पहले तो मैं उनके पीछे
जा न सका,
फिर
साहस जुटा कर भागा --
वो रुके भी..
पर तब मैं
रुक न सका
और सीधा
घर आकर ठहरा!
-- विजय के भटनागर
22.4.1981