सच है -- हर नया मौसम पुरानी याद लेकर आएगा! कल की यात्रा ने 1969 के वो दिन याद दिला दिए जब बड़े भैया जोधपुर में थे। उनके मकान की छत से मैं अपने पचास रुपये के क्लिक कैमरे से स्टेशन के पार्श्व भाग में दीख रहे किले की फोटो लिया करता था। किले में ही देवी का मंदिर है। मानते हैं कि कई युद्ध में उन्होंने नगर की सुरक्षा की। मैं भी तब छत पर आकर उनसे कुछ मांगा करता था। दिल्ली से चलने पर दरवाज़े की ओट से उसने मुझे 'बाय' भी किया था। मैं भी जोधपुर से एक तीन रुपये का सुंदर-सा फिरोज़ी रंग का रुमाल ले गया था। कहते हैं, किसी को रुमाल गिफ्ट नहीं करते। ऐसा क्या? शायद इसीलिए बात नहीं बनी। संस्मरण बन कर रह गए!
No comments:
Post a Comment