Monday, 26 June 2017

कृतज्ञता

गोलू की गुल्लक में जब-तब मां दस का नोट दाल देतीं और कहतीं, 'लक्ष्मी जी दे गयीं हैं!' गोलू जब-तब लक्ष्मीजी की तस्वीर को निहारता रहता। दिवाली पर मां सौ का नोट डाल देतीं और लक्ष्मी जी की कहानियां सुनातीं कि किस तरह वह दिवाली की रात अच्छे लोगों को धन बांटने निकलती हैं। धीरे-धीरे गोलू तक यहां-वहां से चोर, राक्षशों और आसुरी शक्तियों की कहानियां भी पहुंचने लगीं। एक दिन मां ने देखा, वह हनुमान जी की पूजा करने लगा। ..अपने लिए नहीं -- लक्ष्मी जी की 'सुरक्षा' के लिए! 'वह इतनी सौम्य-सुंदर हैं; दिवाली पर अमावस की रात, वह अकेली ही इतने सारे धन-आभूषण के साथ यहां-वहां जाती हैं; उनके पास कोई हथियार भी नहीं होता!' एक रात हनुमान जी उसके सपने में आए तो भी उसने कहा, 'आप लक्ष्मी जी की रक्षा में क्यों नहीं रहते?'  वह बोले, 'मैं लक्ष्मी जी की क्या रक्षा करूं वह तो स्वयं मेरी और हम सबकी रक्षा करती हैं!' पर बाल हठ के आगे उन्हें कहना ही पड़ा, 'ठीक है, कहीं आते-जाते मैं उनके साथ रहा करूंगा!' और सुबह उठने पर गोलू खूब खुश था। शायद यह कृतज्ञता का भाव ही सच्ची पूजा है। हम लोगों की तो भगवान से शिकायतें ही अधिक रहती हैं।

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