बरसों से उधर से गुज़रते वो देखते थे कि बांध में एक दरार-सी पड़ी है। रोज़ाना बढ़ती दरार ध्यान भी उनका ज़्यादा खींचने लगी। दिल में तो रहता था कि अंतर्मन कुछ कह रहा है। .. पर पहल कौन करे? अब पहल भी नहीं करनी कि हर कोई पास पड़े एक-दो पत्थर ही दरार से सटाता रहे, और अंतर्मन को भी समझाना है.. फिर तो यही रास्ता बचता है कि कम-से-कम मूक दर्शक बन कर भीड़ ही जमा कर लो। उसमें तो हम सब माहिर हैं ही। जैसे किसी दुर्घटना में ज़्यादातर लोग करते हैं। कोई-न-कोई भला मानस आ ही जाएगा भीड़ देख कर आगे बढ़ने को। आपको भी संतोष हो जाएगा कि अच्छा किया जो आप दो-चार लोग रुक गए, भीड़ बढ़ती गई और कोई आगे आ ही गया। नहीं तो यह सब कैसे संभव था। समय पर किसी की जान बच ही गई। वरना ऐसे हादसों में रेस्क्यू टीम कैसे पहुंचती! अब, भैया, हम लोग तो व्हाट्सएप आदि के जरिए ही सहायता सहानुभूति संदेश भेजने में माहिर हैं। गुरु-भक्त आरुणि की तरह बरसात में गुरु के खेत की टूटी मेढ़ देख कर वहीं लेट कर तो हम पानी का बहाव रोक नहीं सकते!..
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