वह आंगन बुहार रही थी -- मैं अखबार झाड़ता झुंझला कर बोल उठा -- 'क्यों आंखों में धूल झोंक रही हो?' वह गुर्रायी -- 'दोष देना किसी और को, मैं चली!'
-- विजय के भटनागर 23.9.1975
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