Friday, 16 June 2017

'मुंहफट'

..वो तो रिक्शा खाली थी.. नहीं तो बात पहुंच गई थी थाने.. और अब जा पहुंची मंदिर!.. बस, घर आने से पहले मैडम को कुछ दूर कार चलाने की सूझी। स्टीयरिंग थामते ही चिपका दी सामने रिक्शा में। रिक्शा चालक बेचारा एक झटके से पीछे वाली सीट पर जा बैठा। उस पर भी मैडम का जवाब: "भैया, देख कर चला करो!" लेकिन इस बात का हमारे दिल पर इतना गहरा असर हुआ कि बेटी को जन्मदिन पर छोटी-मोटी कार दिलाने की जो सोच रहे थे, वो उसकी शादी तक पोस्टपोन कर दी थी कि दिल्ली की भीड़भाड़ में तो दिल नहीं मानता। रिक्शा वाली टक्कर के बाद मंदिर भी जाना शुरू तो कर दिया था पर वहां के कायदे-कानून से ज़्यादा वाकिफ नहीं थे। जैसे क्लास में बच्चे बीच-बीच में मास्टर जी से कुछ पूछते रहते हैं, वैसे ही पंडित जी के प्रवचन के दौरान हम हाथ खड़ा कर देते थे। नज़र मिलते ही पंडित जी अपने होठों पर अंगुली रख कर हमें चुप बैठे रहने का संकेत देते रहते थे। एक बार तो उन्होंने हमें 'मुंहफट' ही कह दिया था! बस, इतना पूछा था: 'पंडितजी आपको श्राद्ध के दिनों का ज़्यादा इंतज़ार रहता है या नवरात्रों का?' सालों बाद एक दिन प्रवचन के दौरान फिर हाथ खड़ा करने से हम खुद को नहीं रोक पाए जब वह बोल रहे थे: 'बेटी-दामाद को तो कितना भी देते रहो, पेट ही नहीं भरता।' ..बस, हम बोल पड़े:  '..पर हमारी बेटी तो हमसे पहले से ही 'पेंडिंग' कार भी नही ले रही। दामाद जी भी कहते हैं कि अपनी किसी ज़रूरत के लिए पैसा रखो। अपनी बेटी के रूप में आपने सब दे दिया!' पंडित जी कहने लगे, 'संकल्प की हुई चीज तो देनी पड़ेगी, नहीं तो नरक-वरक..'  डर के मारे हमने पास जाकर कोई उपाय पूछा कि संकल्प की हुई चीज़ किसी और को दे सकते हैं? पंडित जी ने बाद में मिलने को बोला है!..

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