Friday, 23 June 2017

पंडितजी की तलाश में!

कइयों ने कहा कि अगर लड़के वाले अपना पंडित ला रहे हैं तो चुप रहो; अपना पंडित ढूंढने का मतलब कम-से-कम इक्कीस हज़ार पंडित जी के; 9 ग्रह, 27 नक्षत्र के सौ-सौ, पांच हज़ार गौ दान, ये दान, वो दान; बेटी की विदाई के साथ पंडितों की विदाई अलग.. बहुत चूना लग जाएगा!.. जिस तरह हिरणों के झुण्ड में सिंह अकेले चला जाता है, वैसे ही हम होम-वर्क करके पंडित-कॉलोनी में घूम रहे थे। बिना बताए कि हम लड़की के पिता हैं, हमने एक आचार्य से पूछा कि विवाह में किस पक्ष के पंडित की प्रधानता मानी जाती है। उन्होंने भली प्रकार समझाया कि विवाह-मंडप पर वधू का अधिकार है जिसका आयोजन उसके माता-पिता ने किया है। जब तक विवाह संपन्न नहीं हो जाता, वर पक्ष के सभी लोग उनके अतिथि हैं। अतः वधू पक्ष के पंडित की विवाह में प्रधानता है। वर पक्ष का भी पंडित उपस्थित होने पर मंत्रोच्चारण आदि दोनों सम्मिलित रूप से कर लेते हैं। आचार्य जी का "पैकेज" इक्कतिस हज़ार का जान कर हम लौटने लगे तो उन्होंने हमारा बजट पूछा और कम बजट के पंडित जी की उपलब्धता का भी संकेत दिया। तब हमने अपने होम-वर्क की कॉपी उनके सम्मुख खोल दी:  नेट पैकेज ग्यारह हज़ार। अलग से कोई 'विदाई' आदि नहीं। दस हज़ार फेरे समाप्ति पर और दस-दस के नोट की एक गड्डी यानि एक हज़ार पहले जो ग्रह-नक्षत्र तथा अन्य दान आदि के लिए पंडित जी प्रयोग करते रहेंगे (हम बार-बार जेब में हाथ नहीं डालेंगे)। वर पक्ष के पंडित होने पर उनसे ताल-मेल बनाए रखेंगे। वर पक्ष अपनी इच्छा से कुछ दे अथवा न दे, उनसे कुछ नहीं कहेंगे। इसी प्रकार हम उनके पंडित को क्या दे रहे हैं, यह हमारी इच्छा पर निर्भर है। यह सब जानने के बाद आचार्य जी ने एक पंडित को बुला कर हमारा लेन-देन समझाया। छोटे पंडित जी कुछ यूं मुस्काए कि लूटने के सभी दरवाज़े तो हम बंद कर आए हैं।  -- "अपनी स्कूटी पे आएंगे, 101/- तो एक्स्ट्रा दे दीजियो!"  --"202/- ले लीजियो.. बस, "कन्यादान" का नाम न लीजियो!" (हमें  'कन्यादान'  शब्द स्वीकार्य नहीं है और हम इसका मान्य पर्याय ढूंढते रहते हैं।)

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