याद करें, माता-पिता के साथ आपने पहली फिल्म कहां कौनसी देखी थी। मैंने माता-पिता के साथ 'मां-बाप' ही पहली फिल्म देखी, शायद 1959 में; क्योंकि सन '60 का तो मुझे ठीक से याद है कि बड़े भैया के साथ 'जिस देश में गंगा बहती है' देखी थी.. खड़े रह कर! पटियाला रेलवे स्टेशन के पास नए बने 'केपिटल' सिनेमा में पहला 'फ्री-शो' था। आखिर सात-आठ साल के बच्चे के मानस-पटल पर कौनसी तस्वीरें अंकित रह जाती हैं? पहाड़ी बैक-ग्राउंड में डफली बजाते राजकपूर जी के कुछ दृश्य याद रहे। 'दो आंखे बारह हाथ' के गीत का भी एकाध दृश्य अभी तक याद है। 'चलती का नाम गाड़ी' को तो मैं (अपनी और से सही करके) 'चलती गाड़ी का नाम' कहता था। यह फिल्में कभी-कभार हमारी रेलवे कॉलोनी में दिखाई जाती थीं। प्लेटफार्म पर पार्सल-वैन से उतरा ऐसा फिल्मी सामान देख कर हम बच्चे दूर-दूर तक तहलका मचा देते थे। फिल्म चलाते हुए कई बार रील बदली जाती थी। कई बार मन में एक सवाल आता था कि बीच में लगे सफेद परदे पर जो हम फिल्म देख रहे हैं, क्या परदे के पिछली ओर भी नज़र आ रही होगी?!..
Monday, 16 January 2017
'चरण-स्पर्श'!
आठवीं क्लास में एक कहानी पढ़ी थी ('A Boy of Fourteen') जिसमें एक चौदह साल के लड़के की मनः स्थिति का वर्णन था कि किस तरह वह न अपने को बच्चों में पाता है, न बड़ों में; और सही तालमेल न मिलने के कारण किस तरह उसके व्यवहार में एक विद्रोह-सा झलकता है। कुछ ऐसा ही मैं इस अवस्था में पिताजी के साथ रहने लगा था। रिटायरमेंट के बाद वह सबसे बड़े भाई के पास बाड़मेर रुक गए थे। हम सभी वहां गर्मी की छुटियों में गए थे। चारों ओर रेत ही रेत। दिल्ली से जोधपुर होते हुए ट्रेन में उन दिनों तीस घंटे का सफर। पिताजी को वहां छोड़ कर हम सब सुबह 4 बजे की ट्रेन से वापस चलने लगे तो मन किया कि उनके पांव छू कर माफ़ी मांग लूं। पर ऐसा नहीं कर पाया। घर आकर अपने पचास रूपए के 'क्लिक' कैमरे से खींची उनकी एक फोटो बड़ी करा कर उसे मैंने फ्रेम कराया और सामने ही दीवार पर लगा दी कि, आने पर, उन्हें देख कर खुशी होगी। एक रात मैंने सपने में देखा कि पिताजी कमरे में वह तस्वीर देखने आए और चले गए। अगली सुबह हमें पड़ोस के फोन पर उनके स्वर्गवास की दुःखद खबर मिली।
कहानी की कहानी
कहानी की कहानी!
छोटी-मोटी रचनाएं तो हमने काफी लिखीं। कहानी एक ही लिखी ('टूटना') सन 1970 में। उसकी एक प्रति कहीं मिली तो दिल किया टाइप कर रख लें। एकाध जगह पढ़ कर शरम-सी आई तो सोच में पड़ गए कि अब क्या करें। मौलिकता भी नहीं बिगाड़ना चाहते थे। दिन-रात इसी उधेड़बुन में रहते। आखिरकार, एक मध्यरात्रि सेंसरबोर्ड को ही फोन कर दो टूक अपनी समस्या बता दी, "भैया, आप लोग तो एक्सपर्ट हैं, क्या करें -- बारिश में भीगने वाला सीन हटा दें?" उधर से आवाज़ आई, "इनकी सुनो, यह अभी तक सन '70 के बारिश वाले सीन से ही शरमा रहे हैं!" तभी हड़बड़ा कर हमारी आंख खुल गई। लेकिन हमारी शंका का तो समाधान हो ही गया था। इन दिनों दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में कुछ दोस्तों को वह कहानी दिखाने पहुंचे तो सबने उसे एक बेहतरीन मनोवैज्ञानिक कहानी बताया जो 'वर्ल्ड बुक फेयर' में भी 'एंट्री' पा चुकी थी। अरे, भई, कहानी हमारे साथ बुक फेयर में ही तो थी!
Saturday, 14 January 2017
मधुर स्मृति
मधुर स्मृति: उन दिनों पटियाला में दीदी को एम.ए. करते हुए सौ रूपये प्रति माह स्कॉलरशिप मिलता था। उस दिन वह मुझे एक रुपया देतीं। और मैं सुबह नाश्ते के लिए मक्खन की टिक्कियां लेने भागता। तीन आने की एक टिक्की आती, पर कैंटीन वाला मुझे 1 रुपये में 6 टिक्की देता!(1रुपया=16आने, 1आना=4पैसे)। लोहिड़ी के दिनों में "सुंदर-मुंदरिये" सुनाने पर घरों के लोग हम बच्चों की टोली को 1-1 पैसा ही देते थे। एक घर वाले कहते: कल आना, एक रुपया देंगे। रात भर नींद नहीं आती थी। (झूठे कहीं के!) फिर भी, उनका ऐसा कहना, आजतक मन को स्फुरित करता है - लगता है, अपना वो "पेंडिंग" एक रुपया ले आऊं! कैंटीन वाले का भी शुक्रिया करना है। काली माता के मंदिर के भी दर्शन करने हैं जिनसे डर कर मैं अम्माजी की ओट में छुप जाता था। और दुखःनिवारण साहिब गुरूद्वारे के पवित्र सरोवर में जंजीर पकड़ कर नहाते, एक 8-9 साल के बच्चे की तो मुझे हमेशा ही याद आती है। दीदी की ग्रुप फ़ोटो के ऊपर लिखी इस पंक्ति का अर्थ कभी उनसे पूछ ही नहीं पाया: चिर विरह मिलन पुलिनों की सरिता है यह जीवन!..
Friday, 13 January 2017
(कहानी: 1970): 'टूटना'
कहानी (1970): 'टूटना'
पलंग पर कंबल ओढ़े एक बेजान-सा शरीर पड़ा है। कमरे में मेरे पांव रखने की आहट से वह चौंका नहीं है। दरवाज़े मैंने पहले की ही तरह भिड़ा दिए हैं। घर के बाहरी भाग में जितना भी शोर है या नीरवता है, उससे ज़्यादा रूखापन इस कमरे में है। उसने दोनों बाहें कसी हैं और उनमें जकड़ मानो किसी को चूम लिया है! उसकी इस हरकत पर मुझे हंसी आ गई। मैंने उसे छेड़ने की कोशिश की है। शरीर मोड़ते हुए उसने कहा है -- "झूठ मानते हो? मैंने अपने होंठ उसके अधरों पर रख दिए थे! उस तीसरे पहर बारिश भी हुई थी। भीगते हुए उसे मैंने जी भर कर देखा था!.."
अपनी दोनों बाहों के घेरे में पांवों को समेटे मैं 'ट्यूब लाइट' की दूधिया रोशनी में कुछ ढूंढने की कोशिश कर रहा हूं। एकबारगी हमारी नज़रें टकरायी हैं और उसने न जाने कितने सवाल मेरी आंखों में उंडेल दिए हैं! उसकी नज़र 'ट्यूब लाइट' की परिक्रमा कर मानो किसी खास बिंदु पर जम गई है। उसे शायद ज़रा भी अहसास नहीं कि किसी की निगाहें उसे पकड़ रही हैं। रह-रह कर उसके होंठ कुछ कहते प्रतीत होते हैं। मैं यह अनबूझ पहेली सुलझा नहीं पा रहा हूं। गहरी निस्तब्धता में हम दोनों ढंक गए हैं। लगता है वह कोई दर्द भरा गीत गा रहा है और घड़ी की मधुर-ध्वनि अपना संगीत दे रही है!..
"अपने मजबूर क़दमों पर मेरा कोई बस नहीं। तब तक न जाने कैसे बसर होगी। अपने रेलवे प्लेटफॉर्म के किसी भी किनारे मिल जाना जहां स्टेशन के नाम का बोर्ड लगा हो। साल के आखिरी दिन भी नहीं मिल पाओगी तो लगेगा सारा साल तुम्हारे बिना ही बीत गया। दिल नहीं तोड़ना!.."
उसके नाम लिखते ही हवा का एक झोंका उसे कुछ और लिखने की अनुमति नहीं देता। धीरे से उसे संभालते हुए वह तेज़ क़दमों से स्टेशन की ओर बढ़ जाता है। आने-जाने वाली किसी गाड़ी की आवाज़ उसका मन आशंकित कर देती है। रेलवे ब्रिज के नीचे वाली सड़क पर चलते वह आती हुई गाड़ी देखकर दौड़ पड़ता है। उसके सीढियां चढ़ते-चढ़ते गाड़ी थम गई है। हर डिब्बे में नज़र घुमाए वह प्लेटफॉर्म के आखिरी सिरे तक आ पहुंचा है। लौटते हुए उसकी चाल ढीली है और उसके कान गाड़ी छूटने की 'विसिल' की प्रतीक्षा नहीं कर पा रहे हैं। सिग्नल देखने के लिए उसने पीछे गर्दन घुमायी है। एकाएक उसके कदम उसके सामने वाले 'कंपार्टमेंट' के दरवाज़े के बाहर रुक गए हैं। उसकी आंखों में चमक है। आज उसका किसी बाहरी शक्ति में विश्वास हो चला है। अगर हवा का वह झोंका खत न उड़ा ले गया होता तो यह गाड़ी कभी की आंखों से ओझल हो चुकी होती।
उसकी उंगलियां उस खत को छूने लगी हैं जिसके सहारे उसे इंतज़ार के इतने दिन काटने हैं! जिसके माध्यम से उन दोनों को मिलना है! तभी इंजन चीखा है और उसकी उंगलियों से छटपटाता वह खत दोबारा उसी की जेब में ही गिर गया है। उसे कोई तरकीब नहीं सूझ रही है। सिर्फ एक भिखारी उस डिब्बे में चढ़ने की कोशिश कर रहा है। उसने मन ही मन उस भिखारी से कहा है -- "यह चिट्ठी उस शहज़ादी तक पहुंचा देना।" और मनगढ़ंत जवाब भी उसी के मन ने दे दिया है --"कितने पैसे दोगे, बाबू?"
मजबूरी फिर उसके कदम आगे घसीट ले जाती है। उसे बड़ी देर में ख्याल आया कि भिखारी अंधा है। उसने मन ही मन महसूस किया कि उसके भीतर कोई खिलखिला कर हंस दिया है। प्लेटफॉर्म का आखिरी सिरा फिर आ पहुंचा है। उसने खत के टुकड़े-टुकड़े कर बिखेर दिए हैं। लाइनें क्रॉस कर वह दूसरे प्लेटफॉर्म के इर्द-गिर्द लगे जंगलों में बाहें डाल दूर जाती गाड़ी देखता रहा है और उधर ही ढलान पर से उतर गया है।
.."काश, उस भिखारी की आंखें होतीं!" अबकी बार मैंने स्पष्ट सुना है और नज़र बचाने की चेष्टा की है। उस रोज़ उसकी इस बेताबी पर मैं बरबस हंस दिया था। वह चोट आज भी उसके दिल में है।
उसी समय बाहर से किसी की आवाज़ ने इस खामोशी को तार-तार कर दिया है! यह वातावरण मानो उसके अनुकूल नहीं बन पड़ा है। वह उठा है और बिना किसी से कुछ कहे बाहर निकल आया है। 'ट्यूब लाइट' के बराबर टंगी तस्वीर अंधेरे में डूब गई है!
पीछे, खेतों के बीचों-बीच छोटी-सी नहर के किनारे वह पुलिया तक आया है। उसकी यादों ने जब भी उसे रुलाया है, वह यहां आकर रो लिया है। यहां आकर फिर उसका रो लेने को दिल कर आया है; पर आज न जाने कौनसे प्यार ने उसे इतना ढांढस दिया है कि वह अपने पिछले आंसू भी पोंछ गया है। फिर भी एक आंसू उससे संभल नहीं पा रहा है। कुछ ही दूरी पर बिना कुछ कहे वह पीछे छूट गया है।
उसने बहुत धीमे-से दरवाज़ा खोला है, और कहा है-- "शाम ढल गई, वह आई होगी, चलो!" जवाब में मेरी नज़र कैलेंडर पर उठी है और मुझे लगा है -- एक और भूल हो गई! उसने एक और चोट संजो ली है। आज उसे गए सिर्फ तीसरा दिन है।
कुछ देर ठहर उसने कैलेंडर पर आखिरी तारीख के अतिरिक्त वे सभी तारीखें काट दी हैं जब से वह गई है। संयोगवश लकीर आखिरी चौखट में भी घुस आई है। उसके मस्तिष्क ने हाथों से मानो कुछ कहा है और उन्होंने कैलेंडर को एक जोरदार झटका दिया है। कील समेत उखड़ कर वह नीचे फर्श पर आ गिरा है। उसने आखिरी महीने का कवर फाड़ कर सीढ़ियों में फेंक दिया है और पिछले महीने का कवर फिर उसी दशा में टांग दिया है। इससे उसे कुछ आंतरिक संतोष मिला है।
वह पलंग पर आ गिरा है। एक बार फिर उसने 'ट्यूब लाइट' के नज़दीक टंगी तस्वीर को देखा है और मन ही मन 'निर्मोही' कह कर करवट बदल ली है। मैंने कभी उसे, कभी उस तस्वीर को देखा है। उसने दीवार और पलंग के बीच खाली जगह में सर फंसा लिया है और दोनों हथेलियों से आंखें मूंद ली हैं।
आज इकतीस दिसम्बर है!
न जाने कौनसा बहाव उसे स्टेशन तक छोड़ गया है। इंजिन ने 'विसिल' दी है तो उसे लगा है, यह आवाज़ ज़रूर उस तक पहुंच जाएगी और एक बार ज़रूर उसकी बायीं आंख फड़केगी। जाती हुई गाड़ी में से वह पीछे मुड़ कर देखता है -- उसी का एक प्रतिरूप प्लेटफॉर्म के इर्द-गिर्द लगे जंगलों में बांह डाले उसे विदाई दे रहा है। हाथ बाहर निकाल वह उसका जवाब देने को होता है, तो उसकी कामना उसकी आंखों के आगे आ जाती है। वह दूर तक देखता चला जाता है उसे, हाथ हिलाते!..
और एक मुस्कान उसके होठों तक आती है। उसे टूटना नहीं है!
Friday, 6 January 2017
दिल में छुपा के प्यार का तूफान ले चले!
आमतौर पर तो आर्ट-टीचर संवदेनशील ही होते हैं। पता नहीं हमारे सातवीं-आठवीं के आर्ट-टीचर ऐसे क्यों नहीं थे। थोड़ी-बहुत डांट-डपट तो ठीक है। पर वह तो सज़ा पाए छात्र को ही कहते थे, "जा, बेटा, पेड़ से अपनी पसंद की छड़ी तोड़ ला पिटाई के लिए!" ..भाई साहब, आधी जान तो ऐसे ही निकल जाती थी। कुछ खुद निकाल लेते थे स्वयं को मार-मार कर कि कौनसी डंडी 'सलेक्ट' करें। रही-सही कसर वह पूरी कर देते थे! डंडी लेकर क्लास तक का सफर कुछ ऐसा लगता था.. 'हम आज अपनी मौत का सामान ले चले!'
बचपन के दिन
साथ के दशक में दीदी को कॉलेज में 'पार्कर' का एक पेन किसी प्राइज़ में मिला था। उसकी निब के बारे में ही सब "सौ रूपए की है!" कहकर बेहोश होते-होते बचते थे! मैं तब इंग्लिश मीडियम प्राइमरी स्कूल में था। वह रेकॉगनाइज़ न होने के कारण, मेरा दिल्ली आने पर बकायदा एक 'एलिजिबिल्टी' टेस्ट लेकर ही छठी क्लास में दाखिला हुआ था। कॉरपोरेशन के उस स्कूल में हम टाट पर बैठते और 'जी की निब' लगे होल्डर को स्याही की दवात में डुबो कर चार लाइन की कॉपी पर (पुनः) 'ए, बी, सी..' लिखते। (यहां सरकारी स्कूलों में तब छठी से इंग्लिश आरम्भ होती थी।) फिर क्या -- टॉप तो कर गए, पर मास्टर जी की धमकियां हम तक पहुंचने लगीं कि अगली बार वह मुझे फेल करेंगे। कारण? रिज़ल्ट आने के बाद अन्य सब बच्चे उनके घर मिठाई दे आए थे!.. ऐसे ही एक दिन आधी-छुट्टी में मायूस घूमते हनुमान मंदिर को बाहर से ही 'जय' कर चलने लगे तो पांव के नीचे से एक पुराना-सा रुमाल उठाया। उसमें एक-एक के तीन नोट थे। एक रूपए की मिठाई लेकर अगले दिन मास्टर जी के घर गए। खुशी-खुशी उन्होंने वह मिठाई अपने कनस्तर में उंडेल दी! तब से आजतक हम हनुमान जी की पूजा करते आ रहे हैं!