Monday, 29 May 2017

पुकार लो..

पुकार लो --
शायद रुक जाए
लौट आए
जाता हुआ
वसंत!..
समेट कर हमारी
सारी खुशियां,
बीते दिन;
बांध कर
हमारे प्यार का
बचपन,
यौवन --
वो
चला जा रहा है..
पुकार लो --
शायद रुक जाए
लौट आए
जाता हुआ
वसंत!

- विजय के भटनागर (1972)

मेरे शहर की आखिरी सड़क

मैं
अपने शहर की आखिरी सड़क हूं --
वीरान!
कई रात
नींद में अनजाने
दो पांव की
धीमी आहट ने
मुझे चौंका दिया है..
मैंने अपने
स्याह बुरके में से
झांक
आने वाले पथिक को
अपनी बाहों में
भर लिया है..
(उसकी व्यथा सुनी है)
और सुबह
अपना आंचल
गीला पाया है!..

- विजय के भटनागर  (1969)

Saturday, 27 May 2017

- प्रायश्चित -

निकटता से कई बार
मैंने
तुम्हारी पलकों को
छुआ है
रात के अंधियारे में भी
अपनी अंगुलियों पर
खिंच आई
दूज के चांद-सी धीमी
काजल की रेखाओं को देखा है
और अपनी आंखों की
गहराइयों में
उतार लिया है..
इस तरह तुम्हारे आंसू
मैंने
अपनी आंखों में लिए हैं
जो पलकों के
इन्हीं कोर से बहे थे
और मैं पोंछ भी न सका था!

- विजय के भटनागर  (प्रकाशित: 1971)

"प्रेम-शिशु"

तुम्हारे साथ वाले
हमारे उस पुराने मकान
'अतीत' के जीने में
सूर्य की प्रथम किरण
छोड़ जाती है
एक नन्हा सुंदर
किलकारता
शिशु
जो दिन भर
छत पर
खेलता-कूदता
रास्ता भूल कर
उतर जाता है
तुम्हारे आंगन की
सीढ़ियों में -
पर तुम्हारा
दरवाज़े से सटाया
एक बड़ा पत्थर
उससे हटता नहीं
कोई हटाता नहीं
और सूर्य की
अंतिम किरण
उस गुमसुम को
चुपके से ले जाती है
वापस अपने साथ...
एक ही तो 'दीवार' थी
हम दोनों घरों के बीच
जिस पर बैठ अब रात में
उल्लू बोलते हैं --
"जातिवाद! जातिवाद!"

(पालिका समाचार, जुलाई 1980)

Tuesday, 23 May 2017

शब्द-जाल

एक परिश्रमी लकड़हारे का कुल्हाड़ा कुएं में गिर गया था। कुएं से प्रकट हुई एक देवी ने उसे पहले एक सोने का, फिर चांदी का कुल्हाड़ा दिया, जो उसने लेने से मना कर दिया कि उसका नहीं है। प्रसन्न होकर देवी ने उसे उसका लोहे का कुल्हाड़ा देते हुए कोई भी एक वरदान मांगने को कहा। उसने एक दिन की मोहलत ली और घर आकर सबसे पूछा। बूढ़ी माँ ने अपनी आँखों की रौशनी, पत्नी ने संतान, और पिता ने अपना खोया राज्य मांगने को कहा। वरदान एक, इच्छाएं तीन। अंततः वह अपने एक मित्र के पास गया। उसने तुरंत ही उसे सलाह दी कि मांगो: "मेरी माँ अपने राज्य में सुखपूर्वक अपने पोतों का मुख देख सके!" वरदान ग्रान्टेड! पर देवी को लगा कि वह "थ्री-इन-वन" में उन्हें 'चीट' कर गया है। अतः एक चेतावनी भी दे डाली कि आज से तुम्हारे उस कायस्थ (भटनागर, आदि) दोस्त के घर सरस्वती तो रहेगी, किन्तु लक्ष्मी नहीं रहेगी जिसने यह शब्द-जाल बुना है!.. (लगता है, हम व्यर्थ ही सेकंड इनिंग्स के इंटरव्यू दिए जा रहे हैं!)

Friday, 19 May 2017

'नियति'

बड़ा 'इनजस्टिस' लगता था जब किसी रेलवे स्टेशन पर देर से खड़ी हमारी ट्रेन से पहले वो ट्रेन चल पड़ती थी जो बाद में आई। तब अधिकतर 'सिंगल ट्रैक' ही था। बड़े भैया ने इसका तकनीकी कारण बताया था कि आ रही ट्रेन को आगे तक का 'लाइन क्लीयरेंस' दिया जाता है यानी यदि किसी वजह से वह स्टेशन पर रुक न पाए तो सकुशल आगे निकल जाए। इसका लाभ देर से आई ट्रेन को मिल जाता था। बरसों बाद, 20 वर्ष की आयु में, संयोगवश, यही सवाल मेरे रेलवे के पहले इंटरव्यू में पूछा गया। दूसरा सवाल 'हॉबी' पर था। यहां लेखनकला ने बात बिगाड़ दी: आपकी हॉबी तो बहुत 'डेलिकेट' है और रेलवे की नौकरी बहुत कठिन! (आ गए फेल हो कर।)  फिर काफी समय बाद, 1975 में, एयर इंडिया के इंटरव्यू में 'हॉबी' के बारे में पूछा गया। यहां मेरे लेखन को शायद कुछ प्रशंसा मिल जाती, पर (दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है), कह दिया: बागबानी! (आ गए फेल हो कर।) अंततः 1984 में इंडियन एयरलाइन्स में अवसर मिला। एक असंगत उत्तर ने जीवन मे दस साल पीछे कर दिया। नियति है पूर्वनिर्धारित!

'नियति'


बड़ा 'इनजस्टिस' लगता था जब किसी रेलवे स्टेशन पर देर से खड़ी हमारी ट्रेन से पहले वो ट्रेन चल पड़ती थी जो बाद में आई। तब अधिकतर 'सिंगल ट्रैक' ही था। बड़े भैया ने इसका तकनीकी कारण बताया कि आ रही ट्रेन को आगे तक का 'लाइन क्लीयरेंस' दिया जाता है यानी यदि किसी वजह से वह स्टेशन पर रुक न पाए तो सकुशल आगे निकल जाए। इसका लाभ देर से आई ट्रेन को मिल जाता था। बरसों बाद, 20 वर्ष की आयु में, संयोगवश, यही सवाल मेरे रेलवे के पहले इंटरव्यू में पूछा गया। दूसरा सवाल 'हॉबी' पर था। यहां लेखनकला ने बात बिगाड़ दी: आपकी हॉबी तो बहुत 'डेलिकेट' है और रेलवे की नौकरी बहुत कठिन! (आ गए फेल हो कर।)  फिर काफी समय बाद, 1975 में, एयर इंडिया के इंटरव्यू में 'हॉबी' के बारे में पूछा गया। यहां मेरे लेखन को शायद कुछ प्रशंसा मिल जाती, पर (दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है), कह दिया: बागबानी! (आ गए फेल हो कर।) अंततः 1984 में इंडियन एयरलाइन्स में अवसर मिला। एक असंगत उत्तर ने जीवन मे दस साल पीछे कर दिया। नियति है पूर्वनिर्धारित!


वो दिन..

रिटायरमेंट के बाद के वो दिन..

अपनी दूसरी पारी के पहले इंटरव्यू का परिणाम तो निराशाजनक ही रहा। आठ पैसे प्रति शब्द की दर से लेखन की बात पर, एक बार तो हाथ जेब में गोली तलाशने लगे थे। शुक्र है कि एक एनासिन ही मिली। लेकिन वर्क फ्रॉम होम का खुमार सारा दिन मन पर छाया रहा। लगा, बस अब आगे का दरवाज़ा खुलने ही वाला है। और तभी किसी ने दस्तक दी। साथ वाले वर्मा जी के बच्चे थे जिनसे डर कर हमने अपनी सुबह की सैर भी छोड़ दी थी कि फिर कहेंगे: ठंडी हवा खाने जा रहे हो! इंटरव्यू के लिए जाते समय हम अपने सारे कागज़ात ऐसे ही छोड़ गए थे। यह सब देख कर बच्चे कहने लगे: "अंकल आप तो बहुत बिज़ी हो..वर्क फ्रॉम होम? फिर आते हैं।" ..लो जी, देखते ही देखते, हम (काम के न काज के) आस-पड़ोस की नज़रों में  री-एम्प्लॉयड हो गए! फिर क्या था - वर्मा जी की अंगारक टोन ही बदल गई: अरे, आप तो छुपे रुस्तम निकले.. अच्छा है, घर बैठ कर ही इंसान चार पैसे कमा ले। जब खाली हों तो बच्चों को कुछ समझा देना। ..अभी भुनभुना ही रहे थे कि यह आठ से चार पैसों की बात पर आ गए - तभी फिर किसी ने दरवाज़ा खटका दिया। शनिदेव बाबा से नज़र मिली तो वह कुछ सहम कर बोले: हाथ तंग है तो रहने दीजिए!..
हम उन्हें आश्वस्त करते बोले: इतना भी हाथ तंग नहीं है। बीस साल से तो आप आ रहे हैं। वह संकुचा कर बोले: ..नहीं, वो आप कुछ आठ-चार पैसों की बात पर परेशान थे!..

Tuesday, 16 May 2017

मेरी हिंदी उड़ान!


1967-68 में जब मेरी कोई कविता अखबारों के बच्चों के कॉलम में छपती थी तो मैं सुबह-सुबह एक रुपये के पांच-छः अखबार लाता था। कुछ मज़ाक में पूछते: "कोई लॉटरी निकली है क्या?" उन्हीं दिनों पहली प्रशंसा मुझे डॉक्टर जगन्नाथ शर्मा, एम डी, से मिली। उनके स्वास्थ्य प्रश्नोत्तर कॉलम में मैंने अपने नवीं क्लास के दोस्त के पोलियोग्रस्त भांजे के बारे में पूछते हुए डॉक्टरों की मनमानी के बारे में लिखा था कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो एक मां क्या करे! उनके अप्रत्याशित उत्तर की शुरुआत थी: जहां आपकी सयंत भाषा पढ़कर लोग आपको सम्मान सुख देंगे.. (ऐसा क्या? मैं सोचता!) ऐसे कई सुअवसर मेरा 'माइल-स्टोन' बने। स्कूल में गलती से मुझे विज्ञान विषय दिला दिया गया। यहां मैथ्स टीचर पिटाई करते तो हिंदी-इंग्लिश की क्लास में सराहना होती।  'चांदनी रात में झील में नौका-विहार' पर प्रस्ताव लिखने पर मास्टरजी ने सर्वाधिक अंक मिलने पर मेरा नाम पुकारा और "बैठ जाओ" कुछ इस तरह कहा: "इसमें खुशी की कोई बात नहीं। विज्ञान विषयों के साथ आज से तुम लोगों की हिंदी छूट रही है!" जैसे-तैसे पास हुए 40 परसेंट पर दिल्ली कॉलेज में दाखिला कहां मिलता। रो-धोकर गाज़ियाबाद में आर्ट्स में मिला। साहित्य फिर मुझे मिल गया। अंततः मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही हिंदी में एम. ए. किया। और नौकरी के साथ-साथ प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर अनुवाद डिप्लोमा। नई दिल्ली नगर पालिका की नौकरी करते ही मुझे आल इंडिया रेडियो इंदौर का ट्रांसलेटर के लिए ऑफर मिला तथा इंडियन एयरलाइन्स का ट्रैफिक असिस्टेंट के लिए श्रीनगर का। यहां भी विज्ञान विषयों जैसी कुछ स्थिति थी। अंततः विमान के आकर्षण ने खींच लिया..

..मेरी हिंदी-उड़ान के आगे कुछ-न-कुछ अवरोध आता रहा!

Sunday, 14 May 2017

..walking down memory lane!


Since I topped NDMC's Hindi Noting & Drafting Competition thrice consecutively, they were planning to honour me with a Silver Medal. However, I resigned from the civic body before the function and joined Indian Airlines, initially at Srinagar. Here, I began to get their telegrams to make arrangements to reach in time to get the award as "you have to come on the stage first of all". Being on probation, I couldn't make it. Sometime later, our OLIC team visited Srinagar and noticed my small achievements. Had I informed them of my First Prize, I would have been granted special leave and passage to get the same (they told me) that I collected much later. They published my brief profile in our news letter "Image". I was then also deputed as part-time Hindi Translator besides my normal duties as a Traffic Assistant. In 1987, our Srinagar station was awarded the Rajbhasha Trophy for best Hindi work. The Trophy was given to the then Station Manager, Mr. R. Rai by the Lt. Governor at Chandigarh. On his return, Mr Rai gave me two photos of receiving the award which are still with me and being shared with his approval. I also received an appreciation letter in this regard. A special 4-page Souvenir was also published later.

'लगीज पोटर'


मां की कई बातें भी न बच्चों को समझ आने में सारी उम्र निकल जाती है। "पढ़-लिख लोगे तो डंका बजेगा तुम्हारे नाम का, नहीं तो 'लगीज पोटर' ही बनोगे!" तब कूद कर भी मंदिर के घंटे तक हाथ नहीं पहुंचता था। यही सोचते थे कि फिर यह हमारे पढ़-लिख कर पास हो जाने पर कैसे बज जाएगा!.. 'लगीज पोटर' को तो हम 'काला माऊ' की तरह ही कोई डरावनी चीज़ समझते रहे। सालों बाद आज 'मदर्स डे' पर अम्माजी के इन शब्दों का विश्लेषण करने बैेठ ही गए। याद आया -- पिता जी रेलवे में जब टिकट बाबू थे, तब कोई पोर्टर घर पर उनका लंच-बॉक्स लेने आता था। जब कभी रेलगाड़ी से कहीं जाना होता था, तब भी अम्माजी 'लगेज पॉर्टर' को बुलाने को कहती थीं: "अरे, लगीज पोटर नहीं आया?" मन करता है "लगीज पोटर" नाम से ही पुराने संस्मरण लिखूं .. शायद (हैरी पॉटर की तरह) प्रसिद्धि का डंका बज ही जाए!

Thursday, 11 May 2017

Superpower!

It was raining, lightening.. but no light in some parts of Delhi around 9 pm. I was trying to get a pic of lightening in the sky. In the process, an old story came to my mind. That was a heavy downpour when four people took shelter in a hut. What they observed that, many times, the lightening came up to the hut and returned without hurting any body. Soon they thought, out of four of them, one is a wicked person for whom the lightening is waiting for to let him come out of the hut. So, they decided, to move up to a tree oppsite the hut and return one-by-one. The first three completed the exercise and happily returned. Now, they forcefully picked the fourth one and thrown him out of the hut, believing him the wicked-one beyond any doubt, the lightening was waiting for. As soon as he was thrown out of the hut, suddenly there was a thunder and the lightening vanished the hut and the three occupants!..

"पुर!"

गर्मी के वो दिन.. जब पंखा झलते हाथ भी दुखने लगते थे.. तब हवा 'चलाने' के लिए क्या आप भी यह उपाय करते थे? अम्माजी कहती थीं, 21 ऐसे शहरों के नाम बोल दो जिनके अंत मे 'पुर' आता हो, जैसेकि सहारनपुर, फिरोज़पुर..आदि। इसी चक्कर में एकाध घंटा निकल जाता था। थोड़ी-बहुत हवा भी चलने लगती थी!.. आज बरसों बाद सोचा कि देखें वह 'पुर' कहीं हवा के संदर्भ में तो नहीं आता। केवल यही अर्थ मिले - भरा हुआ, पूर्ण, घर, बस्ती, अटारी, नक्षत्र-पुंज..आदि।