मैं
अपने शहर की आखिरी सड़क हूं --
वीरान!
कई रात
नींद में अनजाने
दो पांव की
धीमी आहट ने
मुझे चौंका दिया है..
मैंने अपने
स्याह बुरके में से
झांक
आने वाले पथिक को
अपनी बाहों में
भर लिया है..
(उसकी व्यथा सुनी है)
और सुबह
अपना आंचल
गीला पाया है!..
- विजय के भटनागर (1969)
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