Saturday, 27 May 2017

- प्रायश्चित -

निकटता से कई बार
मैंने
तुम्हारी पलकों को
छुआ है
रात के अंधियारे में भी
अपनी अंगुलियों पर
खिंच आई
दूज के चांद-सी धीमी
काजल की रेखाओं को देखा है
और अपनी आंखों की
गहराइयों में
उतार लिया है..
इस तरह तुम्हारे आंसू
मैंने
अपनी आंखों में लिए हैं
जो पलकों के
इन्हीं कोर से बहे थे
और मैं पोंछ भी न सका था!

- विजय के भटनागर  (प्रकाशित: 1971)

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