Sunday, 14 May 2017

'लगीज पोटर'


मां की कई बातें भी न बच्चों को समझ आने में सारी उम्र निकल जाती है। "पढ़-लिख लोगे तो डंका बजेगा तुम्हारे नाम का, नहीं तो 'लगीज पोटर' ही बनोगे!" तब कूद कर भी मंदिर के घंटे तक हाथ नहीं पहुंचता था। यही सोचते थे कि फिर यह हमारे पढ़-लिख कर पास हो जाने पर कैसे बज जाएगा!.. 'लगीज पोटर' को तो हम 'काला माऊ' की तरह ही कोई डरावनी चीज़ समझते रहे। सालों बाद आज 'मदर्स डे' पर अम्माजी के इन शब्दों का विश्लेषण करने बैेठ ही गए। याद आया -- पिता जी रेलवे में जब टिकट बाबू थे, तब कोई पोर्टर घर पर उनका लंच-बॉक्स लेने आता था। जब कभी रेलगाड़ी से कहीं जाना होता था, तब भी अम्माजी 'लगेज पॉर्टर' को बुलाने को कहती थीं: "अरे, लगीज पोटर नहीं आया?" मन करता है "लगीज पोटर" नाम से ही पुराने संस्मरण लिखूं .. शायद (हैरी पॉटर की तरह) प्रसिद्धि का डंका बज ही जाए!

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