बड़ा 'इनजस्टिस' लगता था जब किसी रेलवे स्टेशन पर देर से खड़ी हमारी ट्रेन से पहले वो ट्रेन चल पड़ती थी जो बाद में आई। तब अधिकतर 'सिंगल ट्रैक' ही था। बड़े भैया ने इसका तकनीकी कारण बताया कि आ रही ट्रेन को आगे तक का 'लाइन क्लीयरेंस' दिया जाता है यानी यदि किसी वजह से वह स्टेशन पर रुक न पाए तो सकुशल आगे निकल जाए। इसका लाभ देर से आई ट्रेन को मिल जाता था। बरसों बाद, 20 वर्ष की आयु में, संयोगवश, यही सवाल मेरे रेलवे के पहले इंटरव्यू में पूछा गया। दूसरा सवाल 'हॉबी' पर था। यहां लेखनकला ने बात बिगाड़ दी: आपकी हॉबी तो बहुत 'डेलिकेट' है और रेलवे की नौकरी बहुत कठिन! (आ गए फेल हो कर।) फिर काफी समय बाद, 1975 में, एयर इंडिया के इंटरव्यू में 'हॉबी' के बारे में पूछा गया। यहां मेरे लेखन को शायद कुछ प्रशंसा मिल जाती, पर (दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है), कह दिया: बागबानी! (आ गए फेल हो कर।) अंततः 1984 में इंडियन एयरलाइन्स में अवसर मिला। एक असंगत उत्तर ने जीवन मे दस साल पीछे कर दिया। नियति है पूर्वनिर्धारित!
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