Saturday, 27 May 2017

"प्रेम-शिशु"

तुम्हारे साथ वाले
हमारे उस पुराने मकान
'अतीत' के जीने में
सूर्य की प्रथम किरण
छोड़ जाती है
एक नन्हा सुंदर
किलकारता
शिशु
जो दिन भर
छत पर
खेलता-कूदता
रास्ता भूल कर
उतर जाता है
तुम्हारे आंगन की
सीढ़ियों में -
पर तुम्हारा
दरवाज़े से सटाया
एक बड़ा पत्थर
उससे हटता नहीं
कोई हटाता नहीं
और सूर्य की
अंतिम किरण
उस गुमसुम को
चुपके से ले जाती है
वापस अपने साथ...
एक ही तो 'दीवार' थी
हम दोनों घरों के बीच
जिस पर बैठ अब रात में
उल्लू बोलते हैं --
"जातिवाद! जातिवाद!"

(पालिका समाचार, जुलाई 1980)

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