Tuesday, 16 May 2017

मेरी हिंदी उड़ान!


1967-68 में जब मेरी कोई कविता अखबारों के बच्चों के कॉलम में छपती थी तो मैं सुबह-सुबह एक रुपये के पांच-छः अखबार लाता था। कुछ मज़ाक में पूछते: "कोई लॉटरी निकली है क्या?" उन्हीं दिनों पहली प्रशंसा मुझे डॉक्टर जगन्नाथ शर्मा, एम डी, से मिली। उनके स्वास्थ्य प्रश्नोत्तर कॉलम में मैंने अपने नवीं क्लास के दोस्त के पोलियोग्रस्त भांजे के बारे में पूछते हुए डॉक्टरों की मनमानी के बारे में लिखा था कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाए तो एक मां क्या करे! उनके अप्रत्याशित उत्तर की शुरुआत थी: जहां आपकी सयंत भाषा पढ़कर लोग आपको सम्मान सुख देंगे.. (ऐसा क्या? मैं सोचता!) ऐसे कई सुअवसर मेरा 'माइल-स्टोन' बने। स्कूल में गलती से मुझे विज्ञान विषय दिला दिया गया। यहां मैथ्स टीचर पिटाई करते तो हिंदी-इंग्लिश की क्लास में सराहना होती।  'चांदनी रात में झील में नौका-विहार' पर प्रस्ताव लिखने पर मास्टरजी ने सर्वाधिक अंक मिलने पर मेरा नाम पुकारा और "बैठ जाओ" कुछ इस तरह कहा: "इसमें खुशी की कोई बात नहीं। विज्ञान विषयों के साथ आज से तुम लोगों की हिंदी छूट रही है!" जैसे-तैसे पास हुए 40 परसेंट पर दिल्ली कॉलेज में दाखिला कहां मिलता। रो-धोकर गाज़ियाबाद में आर्ट्स में मिला। साहित्य फिर मुझे मिल गया। अंततः मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही हिंदी में एम. ए. किया। और नौकरी के साथ-साथ प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर अनुवाद डिप्लोमा। नई दिल्ली नगर पालिका की नौकरी करते ही मुझे आल इंडिया रेडियो इंदौर का ट्रांसलेटर के लिए ऑफर मिला तथा इंडियन एयरलाइन्स का ट्रैफिक असिस्टेंट के लिए श्रीनगर का। यहां भी विज्ञान विषयों जैसी कुछ स्थिति थी। अंततः विमान के आकर्षण ने खींच लिया..

..मेरी हिंदी-उड़ान के आगे कुछ-न-कुछ अवरोध आता रहा!

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