Friday, 19 May 2017

वो दिन..

रिटायरमेंट के बाद के वो दिन..

अपनी दूसरी पारी के पहले इंटरव्यू का परिणाम तो निराशाजनक ही रहा। आठ पैसे प्रति शब्द की दर से लेखन की बात पर, एक बार तो हाथ जेब में गोली तलाशने लगे थे। शुक्र है कि एक एनासिन ही मिली। लेकिन वर्क फ्रॉम होम का खुमार सारा दिन मन पर छाया रहा। लगा, बस अब आगे का दरवाज़ा खुलने ही वाला है। और तभी किसी ने दस्तक दी। साथ वाले वर्मा जी के बच्चे थे जिनसे डर कर हमने अपनी सुबह की सैर भी छोड़ दी थी कि फिर कहेंगे: ठंडी हवा खाने जा रहे हो! इंटरव्यू के लिए जाते समय हम अपने सारे कागज़ात ऐसे ही छोड़ गए थे। यह सब देख कर बच्चे कहने लगे: "अंकल आप तो बहुत बिज़ी हो..वर्क फ्रॉम होम? फिर आते हैं।" ..लो जी, देखते ही देखते, हम (काम के न काज के) आस-पड़ोस की नज़रों में  री-एम्प्लॉयड हो गए! फिर क्या था - वर्मा जी की अंगारक टोन ही बदल गई: अरे, आप तो छुपे रुस्तम निकले.. अच्छा है, घर बैठ कर ही इंसान चार पैसे कमा ले। जब खाली हों तो बच्चों को कुछ समझा देना। ..अभी भुनभुना ही रहे थे कि यह आठ से चार पैसों की बात पर आ गए - तभी फिर किसी ने दरवाज़ा खटका दिया। शनिदेव बाबा से नज़र मिली तो वह कुछ सहम कर बोले: हाथ तंग है तो रहने दीजिए!..
हम उन्हें आश्वस्त करते बोले: इतना भी हाथ तंग नहीं है। बीस साल से तो आप आ रहे हैं। वह संकुचा कर बोले: ..नहीं, वो आप कुछ आठ-चार पैसों की बात पर परेशान थे!..

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