Tuesday, 21 November 2017

फेयरी क्वीन

हमारी 'फेयरी क्वीन' विदेशियों की पसंदीदा ट्रेन है। इसका इंजन विश्व का सबसे पुराना स्टीम इंजन है। पिछले दिनों के प्रदूषण का प्रभाव इस ट्रेन पर भी पड़ा। इस सीजन के दूसरे ट्रिप, 11 नवम्बर, में ही इसमें मात्र 11 यात्री थे। इनमें भी कोई विदेशी पर्यटक शामिल नहीं था। विदेशी पर्यटक कम होने का एक कारण इसका शॉर्ट ट्रिप भी बताया जा रहा है। पहले फेयरी क्वीन, अलवर के सरिस्का तक, दो दिन का ट्रिप कराती थी। पिछले दो सालों से इसका ट्रिप रेवाड़ी तक कर दिया गया, जबकि रेवाड़ी टूरिस्ट स्पॉट नहीं है। शायद यह सीएमडी श्री अश्वनी लोहानी की अनुपस्थिति में लिया गया निर्णय है। (इस अवधि में वह लगभग दो वर्ष के लिए एयर इंडिया के सीएमडी रहे।)

फेयरी क्वीन की मेंटेनेंस रेवाड़ी हेरिटेज लोको शेड में की जाती है। 2012-15 के मध्य बॉयलर में खराबी के कारण यह ट्रैक पर नहीं आ पाई। 2016 में जब यह दोबारा आई तो पर्यटकों में इसका अत्यधिक क्रेज़ था। इस ट्रेन की वापसी डीज़ल इंजन से हो रही है। यह भी इसके आकर्षण में कमी का एक कारण है। इसका तकनीकी कारण है रेवाड़ी पर इंजन मोड़ने की व्यवस्था न होना। वर्तमान स्थिति में इसे मोड़ने पर 2-3 घंटे का समय लग सकता है जिससे अन्य रेलगाड़ियों में भी देरी होगी। ट्रेन के दोनों ट्रिप में बायलर में खराबी आना चिंता की बात है। पहले ट्रिप में गढ़ी हरसरु स्टेशन के निकट बॉयलर खराब हो गया था। किसी तरह लो स्पीड पर ट्रेन को गंतव्य तक लाया गया। दूसरी बार आरम्भ से ही बॉयलर काम नहीं कर रहा था। किसी तरह लो प्रेशर में ही इंजन को रवाना किया गया; किंतु इसके कहीं भी रुकने का डर बना रहा। अप्रैल 2018 तक फेयरी क्वीन हर दूसरे शनिवार को रवाना होगी। अब रेवाड़ी के सफर के दौरान इसमें 2 टन कोयले और 9000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। पानी का टैंकर छोटा होने के कारण इसे रास्ते में दो जगह रोका जाता है। इसका सामान्य किराया 6480 तथा बच्चों के लिए 3240 है। कुछ समय पहले ही 'करीब करीब सिंगल' फिल्म की शूटिंग में भी फेयरी क्वीन का उपयोग किया गया।             (साभार: न.भा.टा)

Wednesday, 8 November 2017

सहृदयता..

अशोकवाटिका में सीताजी को कष्ट सहते देख देवलोक में देवी पार्वती को अपार व्यथा होती और वह शंकर भगवान से इसके निवारण को कहतीं। उनकी यह व्यथा सीताजी के प्रति सहृदयता है। अर्थात सहृदयता एक दैवीय गुण है। वर्तमान समय में भी कुछ लोग सहृदयता से परिपूर्ण हैं व दूसरों के दुःख में साथ देने का प्रयास करते रहते हैं। नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ऐसे ही एक सहृदय भारतीय हैं जिनका जीवन बच्चों का जीवन बेहतर बनाने लिए समर्पित है जिसके लिए वह विश्व के 150 देशों के 83000 से अधिक बच्चों के लिए कार्य कर चुके हैं। कुछ अन्य लोग भी अपने क्षेत्र में इसी सहृदयता से कार्य करते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति निश्चय ही औरों को शीतल छाया देने वाले विशाल वृक्ष की तरह हैं। दूसरी ओर, बेल अथवा कमज़ोर लताओं की यह प्रवृति अथवा विवशता है कि वे अपने निकटतम पेड़ के तने से लिपट जाती हैं।। अपने कार्य के प्रति समर्पित रहते हुए अपने कार्यक्षेत्र व अपने असंख्य कर्मचारियों के जीवन में परिवर्तन लाने का भाव श्री अश्वनी लोहानी के व्यक्तित्व में भी सहज देखा जा सकता है। उनकी कोई पोस्ट किसी भी विषय अथवा कार्य से संबंधित क्यों न हो, अनेकानेक कर्मचारी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं उनके सम्मुख ले आते हैं। एक साधारण कर्मचारी अपने सीएमडी को अपनी पहुंच की सीमा में देखकर भावविभोर हो जाता है। यह 'अनौपचारिक मिलन' उनकी सहृदयता के ही कारण है। औपचारिक रूप में तो 'थ्रू प्रॉपर चैनल' नियमानुसार न चलना स्वयं ही अनुशासनात्मक कार्रवाई के अंर्तगत आता है। शायद आज भी एक कर्मचारी अपनी कोई शिकायत एक-दो स्तर ऊपर तक ही कर सकता है। विन्रम निवेदन है, कोई भी कर्मचारी अपनी किसी शिकायत अथवा आवेदन आदि की प्रतिलिपि सीएमडी को भी सूचनार्थ भेजने को स्वतंत्र होना चाहिए ताकि एक निर्धारित अवधि तक निचले स्तर पर कोई कार्यवाही न होने पर वह उनसे मिल सके।। अंत में, जैसा व्यवहार हम औरों से चाहते हैं, हमें भी अपने संपर्क में आए लोगों से करना चाहिए। यदि हम सब मात्र अपने एक-एक निकटवर्ती घर के ही दुःख में सहायक होने लगेंगे तो स्वयं ही हमारा एक खुशनुमा समाज बन जाएगा!

Friday, 3 November 2017

'ऑरा' (Aura)

"ऑरा" (Aura)

वो कहते हैं
तुम्हारा एंटीना ही
(मेड इन ...)
कृत्रिम है
गलत खबरें 'पिक' कर
प्रसारित कर रहा है..
काफी समझाया कि
एंटीना स्वदेशी है --
कायनात का कण-कण ही
आपके गुण गा रहा है
आपके निर्णयों से अभिभूत
एक सामान्य जन भी
अश्रुपूर्ण शुभाशीष
बरसा रहा है..
आपके मुखमंडल पर
उच्च विचारों का 'ऑरा'
हर ओर प्रकृति को
जगमगा रहा है..
अपनी विद्युतीय तरंगे
स्वयं ही एंटीना तक
पहुंचा रहा है --
मुझे ही नहीं
सभी को आपका यह
भव्य स्वरूप
भरमा रहा है!
 
(अश्वनी लोहानी जी के प्रति)

Tuesday, 31 October 2017

बिल्ली जंक्शन!

बिल्ली जंक्शन!

जिस तरह से पहलवानों का अखाड़ा, ठाकुरों की हवेली या डरपोकों का घर (हमारा) नाम चलन में आ गए, ऐसे ही भगत की कोठी, राय का बाग आदि रेलवे स्टेशनों का नामकरण हुआ होगा। रेलवे के लगभग 8500 स्टेशनों के नामों के अतीत की भी कई रोचक कहानियां होंगी। कोई ऐसा विकिपीडिया अभी तक तो नहीं मिला, शायद भविष्य में कभी मिल जाए। अब दिल्ली का इतिहास तो काफी कुछ पढ़ा है, "बिल्ली" के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई। जी हां, 'बिल्ली जंक्शन' स्टेशन धनबाद क्षेत्र में है। इसी तरह 'काला बकरा' ( जालंधर, पंजाब), 'भैंसा' (मथुरा), 'चिंचपोकली' (मुम्बई) आदि कई रोचक नाम हैं। आत्मीयता दर्शाते भी अनेक स्टेशन हैं - 'सहेली' (भोपाल), 'रानी' (अजमेर), 'साली' (जयपुर),  'बाप' (जोधपुर), 'ओजनिया चाचा' (जैसलमेर) तथा 'नाना' (पाली जिला) आदि। आंध्र प्रदेश के निम्नलिखित स्टेशन को ठीक से लिखने-बोलने वाले को तो लोहानी साहब पुरुस्कृत भी कर सकते है --
"VENKATANARASIMHARAJUVARIPETA"!

Tuesday, 17 October 2017

'ब्लड क्लॉट'

कभी लोहानी जी बुलाएंगे तो जरूर सीधा रेल भवन तक का ही ऑटो करूंगा। वरना तो अब ऑटो वाले भी हमारा 'इकॉनमी ड्राइव' समझने लगे हैं। पेंशन के अभाव में अब इस तरह का मोलभाव करना पड़ता है: 'मेट्रो स्टेशन चलोगे? मीटर में पचास रुपए आने पर उतार देना।' (आगे पैदल!) कुछ ऐसी ही माथापच्ची मेडिकल इंश्योरेंस के लिए करनी पड़ रही है। दस हजार प्रीमियम पर दो लाख का कवर। वो ज़्यादा के लिए कह रहे हैं कि एक छोटा-सा 'ब्लड क्लॉट' ही दो लाख खर्च करा देगा.. स्टेंट अलग। "..तो एकाध स्टेंट कम डलवा लेंगे!"  वह समझ ही नहीं रहे। ..तभी किसी को देखने अपोलो जाना पड़ गया। एक संबंधी का लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था। डोनर उन्हीं की पत्नी थीं जिन्हें एक सप्ताह बाद छुट्टी दी जा रही थी। उनके पति को अभी दस दिन और हस्पताल में रहना है। जहां उनकी इस दशा ने मन को झकझोर दिया, वहीं महिला के प्रति मन श्रद्धा से नतमस्तक हो गया। बातों-बातों में पता चला कि बड़ी सिफारिश पर वहां दाखिला मिल पाया -- कुल 22 लाख के खर्चे पर। अन्य हस्पतालों में यह 'पैकेज' 35 लाख का सुनने में आया। किसी को विपदा में देखकर मानव मन स्वयं उस स्थिति में कल्पना करने लग जाता है। हम तो अभी दस हजार के प्रीमियम पर ही नाप-तोल कर रहे थे। अब तो मन ऐसा बावला हुआ कि घर आते ही भगवान की मूर्ति के पांव पकड़ लिए कि -- "दोनों समय गीता पढूंगा.. मैं नहीं कर सकता इतना सब कुछ.. आप ही बचा लो.. मुझे नहीं लेना कोई इंश्योरेंस.. मुझे नहीं डलवाने स्टेंट्स.. कहीं दिल-दिमाग की किसी नस में कोई ब्लड-क्लॉट आ जाए तो आप ही फूंक मार देना!".. भगवान जी ने व्यंग किया: "मेरी एक फूंक से तो सारी सृष्टि हिल जाएगी.. किसी इमरजेंसी में तो सीएमडी साहब ही एक फोन कर देंगे.. अब तो फेसबुक-फ्रेंड भी हैं.. कल ही तो इतरा रहा था!" .. जब अंत तक हमने भगवान के चरण नहीं छोड़े तो यह निर्णय हुआ कि भले ही हम दस हजार प्रीमियम की मेडिकल पॉलिसी न लें, पर जन्माष्टमी पर मंदिर में चढ़ाए दस रुपये के खोटे सिक्के के बदले अपना सारा खोटापन छोड़ ईश्वर के ही सच्चे नाम का आश्रय लेंगे। बहुत डराता है यह -- ब्लड क्लॉट!

Sunday, 8 October 2017

मधुर स्मृति!

कुछ ही पलों में जहां विमान बादलों में छुप जाता है तो बच्चों का कुतूहल भी समाप्त हो जाता है, वहीं रेलगाड़ी से जुड़ी यादें बरसों बाद भी याद रहती हैं। सन 1957-58 में पटियाला स्टेशन की रेल लाइन पर मानो मैंने किसी सफेद 'परी' को देख लिया हो! कल यह पोस्ट लिखते हुए, अचानक उसका नाम भूल जाने पर मन इतना परेशान हो गया की 'गूगल सर्च' का सहारा लेना पड़ा। तब भी बात नहीं बनी तो रात साढ़े ग्यारह बजे आयरलैंड की एक मिलती-जुलती तस्वीर लोहानी साहब को भेजकर परेशान कर दिया कि सर, बताइए, इसे क्या कहते हैं? ..जी, हां --'ट्राम' (Tram)!.. किसी रेलगाड़ी में उलटा इंजन लगा आ जाना तो हम बच्चों के लिए एक बड़ी बात थी। चार बजे वाली गाड़ी लेकर आता उलटा इंजन हमारे स्टेशन पर पानी 'पीने' भी जरूर जाता था। प्लेटफॉर्म पर पार्सल वैन से जब कभी हम फिल्मों की रीलें उतरतीं देखते तो कालोनी में फिल्म दिखाए जाने का ढिंढोरा पीट देते। दो आंखें बारह हाथ, तूफान और दीया, चलती का नाम गाड़ी जैसी कई फिल्में हमनें देखीं। ग्राउंड के बीच पर्दा लगाकर प्रोजेक्टर पर रीलें बदल-बदल कर चलाई जातीं। एक बार किसी ने कहा: 'यह चलाना सीखना चाहिए।' असिस्टेंट स्टेशन मास्टर मदान साहब ने जवाब दिया था, 'चलाना नहीं, बनाना सीखो।' मेरा मन करता था, पर्दे के पीछे जाकर देखें कि क्या पीछे भी ऐसा दीखता है।  अब तो, बस, यादें दिखाई देती हैं!

बड़ी देर से आए हैं!

बड़ी देर से आए हैं..

आखिर क्या है ऐसा श्री अश्वनी लोहानी की शख्सियत में कि हम एयरलाइन्स की टीम छोड़कर रेलवे टीम में आ गए! यूं तो उनसे बरसों पहले ही मिलना हो जाता। 1972 में ही रेलवे के असिस्टेंट स्टेशन मास्टर का एग्जाम पास किया था। इंटरव्यू में हॉबी के बारे में पूछने पर मैंने कहा 'कविताएं लिखना'। वह बोले, 'आपकी हॉबी तो बहुत सॉफ्ट है, रेलवे की नौकरी बहुत कठिन (सो, रिजेक्टेड)!' चार साल बाद एयर इंडिया के इंटरव्यू में भी यही पूछा गया। पिछले इंटरव्यू से सबक लेते हुए बोल दिया, 'बागबानी!' उनकी नज़रें कह रही थीं, 'मतलब लिखने-पढ़ने से कोई नाता नहीं (रिजेक्टेड)!' फिर छह साल बाद इंडियन एयरलाइन्स में अंत में भी यही सवाल पूछा गया। "..सुबह बागबानी, शाम को लिखना!" सलेक्टेड! ऐसे ही तीस साल बीत गए। ..अब लोहानी साहब का व्यक्तित्व फिर उधर खींच रहा है। वैसे भी रेलगाड़ी की अनेकों यादें हर किसी से जुड़ीं हैं। पिताजी 1968 में और बड़े भाई 1994 में रेलवे से रिटायर हुए थे। बड़ी देर से आए हैं, प्यार का तोहफा लाए हैं!

Shri Ashwani Lohani liked it within minutes!

'बॉम्बे इंजन'

सन 1957 में पिता जी करनाल रेलवे स्टेशन पर टिकट बाबू थे, बड़े भैया चंदौसी में तार बाबू की ट्रेनिंग कर रहे थे.. मैं तब रेलवे क्वार्टर के बाहर खड़ा आती-जाती रेलगाड़ियां देखता रहता। 'फ्लाइंग एक्सप्रेस' तब वहां नहीं रुकती थी। हम सब बच्चे इसकी तेज रफ्तार से बहुत डरते थे। पता नहीं क्यों इसके गोलमटोल इंजिन को हम 'बॉम्बे इंजन' कहते थे। अक्सर एक आर्मी ट्रक उधर से गुजरता। हम बच्चों के हाथ हिलाने पर वह रुक जाता। कुछ जवान हमें उसमें बिठाते और पास ही रेलवे फाटक पर उतार देते। हम वहां से वापस घर भाग आते। फाटक बंद होने पर समझ जाते कि कोई रेलगाड़ी आएगी -- उसकी प्रतीक्षा करते और 'बाय' करते। एक बार पिता जी को दफ्तर के जरूरी काम से लखनऊ जाना था। किसी गाड़ी का समय नहीं था। एक अकेला इंजन जा रहा था। वह उसीमें चले गए थे। ऐसी अजीब बात तो याद रहेगी ही। जाते हुए उन्होंने प्लेटफॉर्म के स्टाल से मुझे एक आने का एक केक भी दिलाया था। और लौटने पर मेरे लिए एक ट्रायसिकल भी लाए थे। करनाल से हम पटियाला चले गए थे और 1962 में दिल्ली आए। करनाल होते हुए पटियाला घूम आने का बहुत मन है।

Friday, 6 October 2017

"भोलू गार्ड"

भारतीय रेल के मस्कट "भोलू" गार्ड को देखकर गार्ड बाबू बड़े भैया की याद आ जाती है। अब भी रात में सिरहानेे टॉर्च रख कर सोते हैं। कभी रात में आंख खुलने पर, फर्श पर पांव रखने से पहले, टॉर्च जलाकर पता नहीं क्या देखते हैं। एक बार पूछ ही लिया। .."रेलवे ट्रेनिंग में सिखाया गया था कि रात में कहीं ट्रेन के रुक जाने पर नीचे उतरने से पहले टॉर्च जलाकर जरूर देख लें कि ट्रेन किसी पुल पर तो नहीं रुकी हुई.. वही आदत पड़ गई 37 साल की नौकरी में!" भोलू निडरता का भी प्रतीक है -- भैया भी। कभी जब उनकी गुड्स-ट्रेन काफी देर बीच जंगल में ही रुकी रहती तो वह नीचे उतर कर इंजिन ड्राइवर से ही इसका कारण पूछने चल देते थे। इंजिन की कूक और गार्ड की झंडी ही तब परस्पर बातचीत का साधन थे। भारतीय रेल अब अपने 164 स्वर्णिम वर्ष पूर्ण कर चुकी है। गार्ड भैया भी इस अवधि की आधी स्मृतियां तो मन में संजोए ही हैं!

Monday, 25 September 2017

सीएमडी (आर)

हमारा पड़ोसी "कार मैकेनिक दिलेर" - "सीएमडी" बुलाने पर खुश हो जाता। रोज़ाना एक दिन पुराना हिंदी का अखबार लेने आता, शाम को वापस कर जाता। बारह साल पहले  मारुति 800 लेने हम उसीको साथ ले गए थे। वह ही उसकी सर्विसिंग आदि करता। 99,999 की मीटर रीडिंग की तो उसने फोटो भी ली थी। चारों व्हील और कई अंजर-पंजर इस अवधि में उसने बदले। कई बार टेम्परेचर की रीडिंग अचानक बढ़ जाने पर मैं उसे अब गाड़ी चलाते डर लगने की बात कहता। वह हर बार कहता, चिंता न करो, आपके लौटते ही देखता हूं। बस, दूसरे कार मैकेनिक दिलावर के पास मत चले जाना। मेरा काम है गाड़ी में जान फूंकना, उसका काम है, गाड़ी बिकवाना। सब उसे "सीएमडी-सेल्स" कहते हैं। कुछ दिन बाद एयरपोर्ट से लौटते, धौला-कुआं के पास छह लेन ट्रैफिक में कार रुक गई। बड़ा अटपटा लगा जब स्टार्ट ही न हो। दिलेर को फोन किया। उसने कहा, बोनट खोलकर पहली पाइप के दोंनो सिरे अदल-बदल कर, इधर का उधर, फिट कर दो। ऐसा करते ही कार स्टार्ट हो गई तो जान में जान आई। लेकिन घर पहुंचने से 4-5 किलोमीटर पहले ही फिर रुक गई। दिसम्बर का महीना था। अपने स्कूटर पर कंबल ओढ़े दिलेर वहां पहुंचा और फिर कार स्टार्ट की। यह बात दिलावर तक भी पहुंची। बोला, "कब तक घसीटोगे -- बावन हज़ार एक.. दो.. चलो, पचपन हज़ार!"  अगले दो दिन छुट्टी थी, सोचा, पहले दिलेर से ही बात करेंगे। पर वह तो आधा इंजिन ही खोल चुका था। "अबकि बार अगर गाड़ी रास्ते में रुक जाए तो सीएमडी मत कहना!" ..दूसरे कार मैकेनिक "सीएमडी-एस" (सेल्स) की तर्ज पर अब दिलेर ने भी अपनी नेम-प्लेट बनवा ली है -- "सीएमडी-आर" (रिवाइव)। अखबार लौटाने आने पर कई बार वह अपने कमेंट्स भी कर जाता है: "कार हो या जहाज, सीएमडी जान फूंकने वाला होना चाहिए। आपके तो अच्छे दिन आते-आते रह गए.. बुला लिया था जान फूंकने वाला सीएमडी.. चल दिए बेचने!"

Friday, 22 September 2017

बड़ी देर से आए हैं ..

बड़ी देर से आए हैं..

आखिर क्या है ऐसा श्री अश्वनी लोहानी की शख्सियत में कि हम एयरलाइन्स की टीम छोड़कर रेलवे टीम में आ गए! यूं तो उनसे बरसों पहले ही मिलना हो जाता। 1972 में ही रेलवे के असिस्टेंट स्टेशन मास्टर का एग्जाम पास किया था। इंटरव्यू में हॉबी के बारे में पूछने पर मैंने कहा 'कविताएं लिखना'। वह बोले, 'आपकी हॉबी तो बहुत सॉफ्ट है, रेलवे की नौकरी बहुत कठिन (सो, रिजेक्टेड)!' चार साल बाद एयर इंडिया के इंटरव्यू में भी यही पूछा गया। पिछले इंटरव्यू से सबक लेते हुए बोल दिया, 'बागबानी!' उनकी नज़रें कह रही थीं, 'मतलब लिखने-पढ़ने से कोई नाता नहीं (रिजेक्टेड)!' फिर छह साल बाद इंडियन एयरलाइन्स में अंत में भी यही सवाल पूछा गया। "..सुबह बागबानी, शाम को लिखना!" सलेक्टेड! ऐसे ही तीस साल बीत गए। ..अब लोहानी साहब का व्यक्तित्व फिर उधर खींच रहा है। वैसे भी रेलगाड़ी की अनेकों यादें हर किसी से जुड़ीं हैं। पिताजी 1968 में और बड़े भाई 1994 में रेलवे से रिटायर हुए थे। बड़ी देर से आए हैं, प्यार का तोहफा लाए हैं!

Shri Ashwani Lohani liked it within minutes!

Thursday, 14 September 2017

हाथी, घोड़ा, पालकी, जय कन्हैया लाल की!

Can you expand these pics into words - a sentence?!

🐘
     🏇
          🚡
               🙏
                     कन्हैया
                               🔴
                                   🔑

Tuesday, 12 September 2017

तेरी कहानी ..

.. फिर तेरी कहानी याद आई!

"किस-मी पारले"

('पारले' मत कहो न!)

Saturday, 9 September 2017

आओ लकीर पीटें (बुद्धिजीवी बनें!)

सांप तो कभी का जा चुका। आओ हम लकीर ही पीट लें -- कहां से आया, कैसे आया, कहां गया। कोई दूरदर्शी ही किसी संभावित खतरे की बात कहता है। कुछ उस से निपटने की तैयारी भी करते हैं। पर एक बड़ा वर्ग तो कुछ हो जाने पर ही अपनी 'फीड बैक' देता है। यह कौनसा आसान काम है। उसके लिए लकीर पीटनी पड़ती है। ऐसे ही थोड़े कोई बुद्धिजीवी का दर्जा हासिल कर लेता है। ऐसे लोग तो हमें जरा नहीं सुहाते जो कहते हैं "अब लकीर पीटने से क्या फायदा"। ऐसे लोग ही बुद्धिजीवियों की दुकान, सम्मेलन, गोष्ठियां, कॉफी हाउस की 'वर्क शॉप' आदि बंद कराना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि नवनिर्माण उनकी 'फीड बैक' पर ही तो होगा। एक तरह से सारा संचारतंत्र बुद्धिजीवियों की इस विचारशिला पर ही टिका है। बरसों पहले रेडियो पर एक प्रोग्राम भी आता था "आओ तबसरा करें"। अर्थात जो हो गया उसका लेखा-जोखा रखें। पूर्व चेतावनी देने वाली दूरदर्शिता अब कहां।'यूरेका' 'यूरेका' चिल्लाता नवीनता का संदेश लिए भी अब कौन भागता है!

                       आधुनिक आर्किमिडीज़!

Friday, 8 September 2017

'आपके वाले' सीएमडी

"नाना जी, मैं छोटी 'सीएमडी' लग रही हूं न?" लोहानी साहब जैसा चश्मा लगा कर मेरी नातिन ने पूछा। मैं समझ गया, मेरा आधा-अधूरा ब्लॉग पढ़ कर अब तो यह छुटकी सवालों की ऐसी झड़ी लगा देगी कि एक कहानी ही बन जाएगी। -- नाना जी, क्या सीएमडी के छोटे-छोटे पंख होते हैं.. फिर वह इतने सारे जहाजों को कैसे देखते होंगे.. क्या वह उड़ते ही रहते हैं.. जमीन पर उनके पांव नही टिकते.. फिर तो वह किसी से मिलते भी नहीं होंगे.. बस, घर से जहाज में बैठे.. इधर-उधर घूमे, मतलब उड़े, और शाम को घर की छत पर उतर गए!.. फिर लोहानी साहब आपको कहां मिले.. वह "उड़ने वाले" सीएमडी क्यों नही थे.. क्या वह "माई फ्रेंड गणेशा" की तरह किसी गुफा में रहते थे.. और किसी के भी बुलाने पर झट आ जाते थे.. किसी को देखने हॉस्पिटल भी चले जाते थे.. सबकी मदद को तैयार रहते थे.. मैंने आपका मोबाइल देखा -- वो तो आपके मैसेज का जवाब भी देते थे.. "वह जमीन से और एक आम आदमी से जुड़े थे" इसका क्या मतलब हुआ?..आपको अपने कई सीएमडी के नाम भी याद नहीं.. फिर लोहानी साहब को क्यों सब लोग इतना प्यार करते हैं.. "पहाड़ पर चढ़ने वाला झुक कर चलता है, नीचे उतरने वाला अकड़ कर चलता है.." यह भी समझ नहीं आया.. अच्छा, अब मैं समझी-- "आपके वाले" सीएमडी "माई फ्रेंड गणेशा" की तरह थे--लाखों में एक!

("Touched I am!" Mr. Ashwani Lohani comments)

Friday, 1 September 2017

रामायण: आनुषंगिक कथाएं

सीता-राम के विवाह से पूर्व एक रोज़ राजा जनक के दरबार में एक भोज का आयोजन था। विविध पकवान परोसे जा रहे थे। जैसे ही राजा जनक ने खीर खाना आरम्भ किया, सीता जी की नज़र उनके खीर के पात्र में एक तिनके पर पड़ी। भरी सभा में कुछ कहना उन्हें उचित नहीं लगा और न ही वह उसे अनदेखा कर सकती थीं। तभी उन्होंने एकटक उस तृण को देखा। अगले ही क्षण वह जल कर खीर के पात्र के एक किनारे चिपक गया। राजा जनक ने यह सब होते हुए देख लिया। सभा समाप्ति पर उन्होंने अपनी पुत्री से कहा, "मैं जान गया कि आप भगवती स्वरूपा हैं; किंतु कभी अपनी शक्ति का प्रयोग किसी के अहित में नहीं करना।" अशोक वाटिका में रावण के आने पर सीता जी का हाथ में एक तृण पकड़े रहना अपने पिता की इसी बात को स्मरण रखना था अन्यथा रामकथा ही बदल जाती। कुछ लोगों का इसे डूबते को तिनके का सहारा कहना नितांत हास्यास्पद है। सीता जी को स्पर्श कर पाना ही असंभव था; फिर उनका हरण कैसे हुआ। इस संबंध में भी एक कथा का प्रसंग है। वनवास के समय एक रोज़ लक्ष्मण जी की अनुपस्थिति में श्री राम ने सीता जी को अग्निदेव के संरक्षण में सौंपा और तत्पश्चात वह उनका प्रतिबिंब मात्र रहीं। रावणवध के पश्चात तथाकथित अग्नि परीक्षा का आशय भी अग्निदेव से सीता जी को वापस लेना था। लक्ष्मण जी का क्रोध देखकर उस समय ही श्री राम ने उन्हें वास्तविकता से अवगत कराया था।

Friday, 25 August 2017

ॐ गं गणपतये नमः


गणेश चतुर्थी को गणेशजी का प्राकट्य दिवस माना जाता है। यह पर्व अनंत चतुर्दशी तक मनाया जाता है (इस वर्ष 25 अगस्त - 5 सितम्बर 2017)। आज गणेश जी की प्रतिमा की स्थापना का शुभ मुहूर्त दोपहर 12 से 1:30 बजे तक है। घर में स्थापना हेतु पीले अथवा लाल रंग (रक्त वर्ण) की मध्यम आकार की प्रतिमा ही उपयुक्त मानी जाती है। प्रायः लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछा कर उन्हें स्थापित किया जाता। घी का दीपक जला कर उन्हें मोदक (लड्डू) का भोग लगाया जाता है और दूर्वा (दूब घास के कौंपल) अर्पित किए जाते हैं। पुरानी कथाओं के अनुसार इस चतुर्थी का चंद्र-दर्शन शुभ नहीं माना जाता। अतः जो लोग इस दिन उपवास रखते हैं वे रात को चंद्रमा को अर्ध्य देते हुए नीची दृष्टि रखें। गणेश जी को कभी तुलसी की पत्तियां भी अर्पित नहीं की जातीं। कुछ अन्य रंग की गणेश प्रतिमाओं का वर्णन इस प्रकार मिलता है: नीले रंग और हरिद्रा (हल्दी) गणेश जी की प्रतिमा का पूजन विशेष कामनाओं के लिए; श्वेत वर्ण वाले ऋण-मोचन; एकदंत श्याम वर्ण वाले अद्भुत पराक्रम; चार भुजाओं रक्त वर्ण वाले संकष्टहरण गणेश माने जाते हैं। त्रिनेत्रधारी रक्तवर्ण के दस भुजाओं वाले "महागणपति" में उपरोक्त सभी का समावेश माना जाता है।

गणपति वंदन

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ:।
निर्विध्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥


Wednesday, 23 August 2017

'ब्लड क्लॉट'

बहुत डराता है यह ('ब्लड क्लॉट')!

29 फरवरी को जन्में लोग भी न, साठ साल की उम्र में भी पंद्रह साल के बच्चे जैसी बातें करते हैं। अब मेडिकल इंश्योरेंस का प्रीमियम इस उम्र में पच्चीस हजार सालाना तो बनेगा ही। इसी उलझन में थे कि इतना तो दे नहीं सकते, फिर पांच की बजाय तीन-साढ़े तीन लाख का इंश्योरेंस करा लेते हैं। तभी किसी को देखने अपोलो जाना पड़ गया। एक संबंधी का लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था। डोनर उन्हीं की पत्नी थीं जिन्हें एक सप्ताह बाद छुट्टी दी जा रही थी। उनके पति को अभी दस दिन और हस्पताल में रहना होगा। जहां उनकी इस दशा ने मन को झकझोर दिया, वहीं महिला के प्रति मन श्रद्धा से नतमस्तक हो गया। बातों-बातों में पता चला कि कहीं-कहीं की सिफारिश पर वहां दाखिला मिल पाया -- कुल 22 लाख के खर्चे पर। अन्य हस्पतालों में यह 'पैकेज' 35 लाख का सुनने में आया। कहते हैं किसी को विपदा में देखकर मानव मन तत्काल स्वयं की उस स्थिति में कल्पना करने लग जाता है। हम तो अभी 20-25 हजार के प्रीमियम पर ही नाप-तोल कर रहे थे। अब तो मन ऐसा बावला हुआ कि घर आते ही भगवान की मूर्ति के पांव पकड़ लिए कि -- "दोनों समय गीता पढूंगा.. मैं नहीं कर सकता इतना सब कुछ.. आप ही बचा लो.. मुझे नहीं लेना कोई इंश्योरेंस.. मुझे नहीं डलवाने स्टेंट्स.. कहीं दिल-दिमाग की किसी नस में कोई ब्लड-क्लॉट आ जाए तो आप ही फूंक मार देना!".. भगवान जी ने व्यंग किया: "मेरी एक फूंक से तो सारी सृष्टि हिल जाएगी.. किसी इमरजेंसी में तो एमडी साहब ही एक फोन कर देंगे.. अब तो फेसबुक-फ्रेंड भी हैं.. कल ही तो इतरा रहा था!" .. जब अंत तक हमने भगवान के चरण नहीं छोड़े तो यह निर्णय हुआ कि भले ही हम 20 हजार प्रीमियम की मेडिकल पॉलिसी न लें, पर जन्माष्टमी पर मंदिर में चढ़ाए 10-10 रुपये के दो खोटे सिक्कों के बदले अपना सारा खोटापन बदल कर ईश्वर के ही सच्चे नाम का आश्रय लेंगे।