एक तो रेगिस्तान में ऊंट की सवारी करते बच्चे वैसे ही डर रहे थे, ऊपर से हमने उनको 'गुमनाम' फिल्म की कहानी सुना दी कि किस तरह एक हवाई जहाज़ कुछ लोगों को जंगल में छोड़ कर उड़ जाता है। उस पर ऊंट वाले ने कह दिया, "ऊंट को बांधने की रस्सी तो मैं लाया ही नहीं, रात में अगर यह कहीं चला गया, तो अगले दिन अपने आप पैदल चले जाना!" हमने सबको आश्वासन दिया, "अरे! रस्सी की तो परवाह मत करो। हमें बिना रस्सी के भी ऊंट बांधना आता है!" ऊंट वाले ने मज़ाक समझा। बच्चे पूछ बैठे, "कैसे? कैसे?" हमने समझाया, "जैसे तुम्हारे पेट का दर्द हम दवा के नाम पर पिसी हुई चीनी की पुड़िया से ठीक कर देते थे!" ('प्लेसबो इफ़ेक्ट'!) बातों-बातों में गांव में रुकने का स्थान भी आ गया। ऊंट वाला बोला, "अब जब तक इसको खूंटी पर रस्सी से बांधूगां नहीं, यह बैठेगा नहीं।" हमने उसे कहा, "ऊंट के गले में रस्सी बांधने का केवल नाटक करो जैसे रोज़ाना बांधते हो।" यह क्या.. ऊंट तो सचमुच ही बैठ गया। सब निश्चिन्त हो गए। सुबह फिर वह भागा-भागा आया, "अब तो ऊंट उठ ही नहीं रहा!" अबकी बार बच्चों ने ही उसे समझाया, "भैया, 'बंधा हुआ' ऊंट कैसे उठेगा? पहले उसे खोलो तो सही!" ऊंट वाला समझ गया और उसे खूंटी से खोलने का अभिनय करने लगा। कई बार हम सब भी ऐसे ही निराधार बंधनों से बंधे रहते हैं।
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