Sunday, 5 February 2017

मेरा बगीचा

पचास साल पुरानी रेलवे स्टेशन के पास वह दुकान अब पहचान में नहीं आती जहां से मैं कितने ही फूलों और सब्जियों के बीजों के छोटे-छोटे पैकिट ले जाया करता था। हम दिल्ली शाहदरा में थे। पिता जी के मेरठ रेलवे क्वार्टर में हर हफ्ते जाते थे। मैं तो बाकि दिन पहले ही कागज़ पर अपने बगीचे की रूप-रेखा तैयार करता रहता था -- तिरछी ईंटों से सजे रास्ते से लेकर अलग-अलग फूलों के स्थान तथा सब्जियों की क्यारियों तक। मेरे लगाए प्रायः सभी पौधे खूब बढ़ते। सबसे अधिक भिंडी के पौधे और मेथी लहलहाती। छोटे-छोटे आलुओं को क्यारी में कई मेढ़ बनाकर मैं लगाता। कुछ दिन बाद पौधे उगते-बढ़ते और जड़ में एक आलू के ढेरों आलू लग जाते। कुछ ऊंची मेढ़ में बोए होने के कारण वे अच्छी तरह विकसित होते और निकालने में भी कठिनाई नहीं होती। घर के खुले आंगन में भी कहीं-कहीं से एक-दो ईंटें निकाल कर गुलाब की कलमें और चमेली के पौधे लगाता। एक रोज़ मैंने गिना -- गुलाब पर पचास फूल थे और चमेली पर सौ से अधिक। चमेली के पौधे के पास मैंने पचास रूपए के क्लिक कैमरे से पिता जी की फोटो भी खींची थी, और बड़ी भी कराई; पर घर में वह कोई संभाल कर नहीं रख पाया। पौधों को पानी देने की रबड़ की कोई लंबी पाइप बचपन में न ले पाने का बहुत दुःख होता था। साईकिल के पुराने टायरों की ट्यूब काट-काट कर पाइप बनाता था जो कई जगह से लीक ही करती रहती थी!..

No comments:

Post a Comment