सबसे बड़े भैया 15-16 वर्ष की आयु से ही वॉलीबॉल खेल के बहुत शौकीन थे। सुबह चार बजे उनकी टोली एक-दूसरे को जगा कर अपने नियत स्थान पहुंच जाती। पहले बाउंडरी वॉल के 3-4 चक्कर लगाते और फिर आखिरी लैंप-पोस्ट की रौशनी में नेट गाड़ते। दोनों ओर तीन-तीन, कभी चार-चार खिलाडी होते। सुनसान जगह का नाम न ही पूछें तो अच्छा है। वैसे खुद ही समझ आ जाएगा। खेल के प्रायःदो घंटे बाद सुबह का उजाला हो जाता था। एक रोज़ यह सब काफी थक गए। काफी पावर-पैक्ड मैच रहा। हर कोई यह जानना चाह रहा था कि दूसरी ओर से इतना शक्ति-प्रदर्शन आज कौन कर रहा है और दिन भी नहीं निकला। वैसे तो भैया बहुत साहसी रहे हैं, पर उस रात अपनी टीम के साथ वह भी भाग लिए.. जब सबने देखा कि वे सब तो नेट के एक ही ओर हैं..तो दूसरी ओर से कौन खेल रहा है!.. घर की बजाय स्टेशन पास था। वहीँ रुक कर देखा--अभी रात के ढाई बजे थे! मध्य-रात्रि का पावर-पैक्ड मैच वह पता नहीं किस टीम के साथ खेल आए थे?!
Ssh... Who's on the other side?!
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