ना, ना.. घसीटते हुए तो मुझे स्कूल नहीं ले जाते थे। बस, कुछ दिन मैं अम्माजी को पास बैठाए रखता था। प्रेयर में मैडम मुझे भी आंखें बंद करने को कहतीं और अम्माजी खिसक जातीं। पीछे-पीछे मैं। धीरे-धीरे तो मुझे स्कूल जाना बहुत अच्छा लगने लगा। कुछ समय बाद बड़ी दीदी भी उसी स्कूल में पढ़ाने लगीं। मेरी तीन रूपए की फीस भी तब माफ हो गई थी। अब इतने छोटे बच्चे को क्या पता कि फीस किसको कितनी देनी है। हर महीने दस तारीख के बाद एक दिन हेड मिस्ट्रेस कहतीं कि जिन बच्चों ने फीस नहीं दी है, वो अभी घर जाकर लाएं। मैं भी घर चल पड़ता। इतनी पास भी नहीं था। घर पहुंचता तो सब वापस भेज देते। फिर क्लास में आकर बैठ जाता। कहता कोई कुछ नहीं था, पर यह भी नहीं कहता था कि मैं न जाऊं। अब सब बच्चे आज्ञा मानते फीस लेने घर जाते तो मैं भी चल देता था। वैसे, यह 'फीस माफ' सालों बाद काफी महंगी पड़ी। मैथ्स में कमज़ोर रह गया। दीदी एक दिन पहले ही पेपर करा देती थीं।
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