Friday, 10 February 2017

बेटी - 'दूरे-स्थापिता'!

हमारे हिंदी के प्राध्यापक डॉ योगेंद्र नाथ शर्मा 'अरुण' सदस्य - साहित्य अकादमी तथा गढ़वाल विश्वविद्यालय के मनोनीत चांसलर भी रहे। उन्होंने ही एक रोज़ क्लास में बताया था कि चावल को 'दूरे स्थापिता' भी कहते हैं क्योंकि कुछ बढ़ते ही उनके पौधों को कुछ दूर-दूर रौंप दिया जाता है। यह शब्द उन्होंने 'बेटी' का भी प्रयाय कहा जो विवाह के बाद दूर जा बस्ती है ('और घर में उसके झूले खाली रह जाते हैं', मैंने जोड़ दिया है)! विदाई के समय बेटी द्वारा अपनी दहलीज़ पर न्यौछावर की जाने वाली खीलें भी चावल का ही एक रूप हैं। अपने सीमित ज्ञान के दायरे में 'चावल' शब्द की उत्पत्ति के रूप में मुझे कहीं भी 'दूरे स्थापिता' शब्द नहीं मिला; किंतु 40 साल बाद अपने प्राध्यापक का परिचय अवश्य मिल गया। स्मृति स्वरूप यह पोस्ट उनको भी भेज रहा हूं।

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